केले की खेती करने वाले किसानों के लिए सितंबर का महीना सबसे ज्यादा चुनौती भरा माना जाता है. मानसून की जाने और मौसम के बदलते मिजाज के बीच इस समय खेतों में उमस और नमी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. यही वह वक्त होता है जब जरा सी लापरवाही भी पूरे बाग पर भारी पड़ सकती है. इस महीने में तेज हवाओं, खेत में पानी के ठहराव और फंगल इन्फेक्शन का खतरा अपने चरम पर होता है.
अगर समय रहते सही देखभाल न की जाए तो पौधों की जड़ें गलने लगती हैं और तने कमजोर होकर जमीन पर गिर जाते हैं. कई किसान साल भर खून-पसीना बहाकर फसल तैयार करते हैं. लेकिन सितंबर में मौसम और बीमारियों के खतरे को भांप नहीं पाते है. जिससे तैयार फसल कुछ ही दिनों में बर्बाद हो जाती है. इसलिए अगर आप केले से बंपर पैदावार और अच्छा मुनाफा चाहते हैं. तो इस महीने इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है.
खेत में पानी रुकने से नुकसान
सितंबर के महीने में अक्सर रुक-रुक कर तेज बारिश होती है. जिससे खेतों में पानी जमा होने लगता है. केले के पौधे को नमी तो पसंद है लेकिन उसकी जड़ों के आसपास पानी का लंबे समय तक रुकना बिल्कुल सही नहीं होता. जलभराव होने से मिट्टी में ऑक्सीजन का फ्लो रुक जाता है और जड़ें तेजी से सड़ने लगती हैं, जिसे रूट रॉट बीमारी कहा जाता है. जड़ सड़ते ही पौधा जमीन से जरूरी पोषक तत्व खींचना बंद कर देता है.
पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगती हैं और पौधा पूरी तरह बेजान हो जाता है. इससे बचने के लिए सबसे पहला काम यह करें कि खेत में जल निकासी का पक्का इंतजाम रखें. मेड़ों के बीच ऐसी नालियां बनाएं जिससे बारिश का एक्सट्रा पानी तुरंत बाहर निकल जाए. खेत की मिट्टी में नमी बनाए रखें. लेकिन पानी बिल्कुल न भरने दें.

फंगल बीमारियों से ऐसे बचाएं बाग
हवा में ज्यादा नमी और दिन के समय तेज धूप का फंगस को पनपने के लिए सबसे सही माहौल देती है. इस मौसम में केले की फसल पर सिगाटोका लीफ स्पॉट और पनामा विल्ट जैसी फंगल बीमारियों का हमला सबसे ज्यादा होता है. सिगाटोका में पत्तियों पर हल्के पीले और भूरे रंग के धब्बे बनने लगते हैं. जो धीरे-धीरे पूरी पत्ती को सुखा देते हैं.
पत्तियां सूखने से पौधे की फोटोसिंथेसिस प्रोसेस रुक जाती है और फलों का साइज छोटा रह जाता है. वहीं पनामा विल्ट पौधे के तने को भीतर से सड़ा देता है. इसके लक्षण दिखते ही तुरंत प्रभावित और सूखी पत्तियों को काटकर खेत से बाहर ले जाकर नष्ट कर दें. इसके बाद किसी अच्छे फंगीसाइड जैसे कार्बेन्डाजिम या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का पानी में घोल बनाकर पूरे पौधे और जड़ों के पास तुरंत छिड़काव करें.

यह भी पढ़ें: अदरक की खेती से कितना कमा सकते हैं किसान, जान लीजिए मुनाफे का गणित
तेज हवाओं में गिरने से कैसे बचाएं?
सितंबर के दौरान मौसम अचानक बदलता है और कई बार तूफानी हवाएं चलने लगती हैं. इस समय तक केले के पौधों पर भारी-भरकम फलों के गुच्छे लद चुके होते हैं. जिससे पौधे का पूरा संतुलन बिगड़ जाता है. तना भारी होने की वजह से तेज हवा का एक झोंका भी पौधे को बीच से तोड़ देता है कई बार जड़ समेत उखाड़ फेंकता है. इस नुकसान से बचने के लिए तुरंत पौधों को मजबूत बांस की बल्लियों का सहारा दें.
इसके अलावा पेड़ के मुख्य तने के नीचे से निकलने वाले गैर-जरूरी कल्लों यानी सकर को समय-समय पर काटते रहें. यह कल्ले पौधे का सारा पोषण चूस लेते हैं और मुख्य पौधे को कमजोर बना देते हैं. अगर आप पौधों को समय पर सहारा देंगे और पोषण का संतुलन बनाए रखेंगे. तो फसल सुरक्षित रहेगी और बाजार में आपको क्वालिटी फलों के पूरे दाम मिलेंगे.
यह भी पढ़ें: बिहार में दाल मिल लगाने का मौका, 25 लाख दे रही सरकार
