दिल्ली की हवा में इन दिनों एक बीमारी घर कर गई है. बदलते मौसम में लोग अचानक से बीमार पड़ने लग गए हैं और इसका कारण है H1N1 वायरस जिसे स्वाइन फ्लू भी कहा जाता है. पिछले साल के मुकाबले इस साल इस वायरस से संक्रमित लोगों के आंकड़े में काफी इजाफा देखने को मिला है. इंसानों में बढ़ते इस खतरे के बीच अब पशुपालकों और किसानों की चिंता भी बढ़ गई है. सोशल मीडिया पर उड़ती अफवाहों ने तबेले और डेयरी चलाने वालों की मन में भी डर बैठ गया है.
लोगों के मन में डर है कि क्या यह जानलेवा वायरस अब उनके मवेशियों गाय और भैंसों को भी अपनी चपेट में ले रहा है? लेकिन क्या वाकई ऐसी सिचुएशन पशुपालकों को घबराने की जरूरत है. या पहले यह जानना जरूरी है कि क्या मवेशी भी स्वाइन फ्लू का शिकार होते हैं. अगर हां तो उन्हें इससे कैसे बचाया जा सकता है. चलिए आपको बताते हैं पूरी खबर.
क्या सच में गाय-भैंस को स्वाइन फ्लू होता है?
अगर आप भी पशुपालक हैं और आपके मन में भी यह सवाल आ रहा है कि गाय और भैंस को इंसानों वाला स्वाइन फ्लू यानी H1N1 वायरस परेशान कर सकता है. तो आपको बता दें इसका जवाब है नहीं. स्वाइन फ्लू मू सूअरों में पाया जाने वाला इन्फ्लूएंजा वायरस है. जो म्यूटेट होकर इंसानों में तेजी से फैलता है. भले ही पशुओं को स्वाइन फ्लू वायरस से प्रभावित न किया हो. लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपके मवेशियों को फ्लू की परेशानी नहीं हो सकती.
पशुओं का अपना एक अलग रेस्पिरेटरी सिस्टम होता है. मवेशियों में इन्फ्लूएंजा डी और बोवाइन रेस्पिरेटरी डिजीज जैसे वायरस परेशान कर सकते हैं. जिनके लक्षण बिल्कुल स्वाइन फ्लू जैसे ही नजर आते हैं. जब मौसम बदलता है या उनके आसपास प्रदूषण और गंदगी ज्यादा होती है. तो जानवरों की इम्यूनिटी कमजोर पड़ने लगती है. ऐसी स्थिति में वह रेस्पिरेटरी इंफेक्शन की चपेट में आ जाते हैं. इसलिए ह समझना जरूरी है कि मवेशियों के फेफड़ों का इंफेक्शन भी उतना ही खतरनाक हो सकता है. जितना इंसानों के लिए स्वाइन फ्लू.

कैसे इसके लक्षण पहचानें?
इंसानों की तरह जानवर अपनी तकलीफ बोलकर बयां नहीं कर सकते. इसलिए उनके हाव-भाव और रोजमर्रा के रूटीन पर नजर रखना जरूरी है. अगर कोई मवेशी रेस्पिरेटरी और वायरल इंफेक्शन की चपेट में आता है. तो सबसे पहला असर उसके तापमान पर दिखता है. जानवर को तेज बुखार हो सकता है, कान ठंडे या बेहद गर्म पड़ जाते हैं और वह सुस्त होकर बैठ जाता है. इसके अलावा नाक और आंखों से लगातार पानी या गाढ़ा बलगम आना, बार-बार छींकना और घरघराहट के साथ सूखी खांसी चलना इसके बड़े संकेत हैं.
बीमार पशु अचानक चारा खाना और पानी पीना लगभग छोड़ देता है जिससे जुगाली बंद हो जाती है. दुधारू मवेशियों में दूध का उत्पादन एकदम से 40 से 50 फीसदी तक गिर जाता है. अगर जानवर सांस लेते समय गर्दन आगे खींचने लगे या मुंह खोलकर हांफने लगे तो समझिए फेफड़ों में जकड़न बढ़ चुकी है और तुरंत इलाज की जरूरत है.
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इन तरीकों से अपने जानवरों को रखें महफ़ूज़
इलाज से हमेशा बेहतर बचाव होता है और बाड़े में थोड़ी सी सतर्कता आपको बड़े नुकसान से बचा सकती है. इसके लिए सबसे पहले जैसे ही कोई पशु खांसता या सुस्त दिखे उसे तुरंत बाकी तंदुरुस्त जानवरों से अलग हवादार जगह पर बांधें. तबेले में साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें, फर्श पर पानी या कीचड़ जमा न होने दें और हफ्ते में दो बार डिसइंफेक्टेंट का छिड़काव करें जिससे बैक्टीरिया और वायरस न पनपें.

मवेशियों को कभी भी बासी या फफूंद लगा सूखा चारा न दें. बल्कि उनकी डाइट में मिनरल मिक्सचर, ताजा हरा चारा और साफ गुनगुना पानी शामिल करें जिससे उनकी इम्यूनिटी मजबूत बनी रहे. सबसे जरूरी बात यह है कि किसी घरेलू नुस्खे के भरोसे न बैठें. अगर दो दिन के भीतर बुखार या खांसी में आराम न मिले तो तुरंत किसी रजिस्टर्ड वेटरनरी डॉक्टर से संपर्क कर सही इलाज शुरू करवाएं.
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