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सोयाबीन में बढ़ा बीमारी का खतरा? एक्सपर्ट्स से जानें बचाव के उपाय

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ABP News
September 11, 20263 min read
सोयाबीन में बढ़ा बीमारी का खतरा? एक्सपर्ट्स से जानें बचाव के उपाय

सोयाबीन मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में में सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसल है. और इसका उत्पादन भी यहां अच्छी मात्रा में होता है. इसलिए यहां के किसानो की यह फसल पहली पसंद है. लेकिन सोयाबीन की फसल में बीमारी की चिंता भी लगी रहती है. बारिश और मौसम में बदलाव के कारण बीच खेत में ज्यादा नमी रहने पर कुछ बीमारियों और कीटों का खतरा बढ़ सकता है. अगर शुरुआत में ही आप सोयाबीन की फसल में बीमारी और कीटों की पहचान कर ली जाएं. तो फसल में कम नुकसान हो सकता है. सोयाबीन की पत्तियों का रंग बदलना, पत्तियों पर धब्बे आना, पौधे का कमजोर होना या तने और जड़ों के पास सड़न दिखाई देना ये कुछ ऐसे संकेत हैं जिन पर किसान को ध्यान देना चाहिए.

सबसे पहले खेत में फसल को ध्यान से देखें

सोयाबीन की फसल में बीमारी या कीट का असर अचानक से पूरे खेत में नहीं फैलता. उसकी शुरुआत कुछ पौधों या कुछ हिस्सों में ही दिखाई देती है. इसलिए किसान को समय-समय पर खेत में जाकर पौधों की पत्तियों, तने और जड़ों को देखना चाहिए. अगर पत्तियों पर धब्बे दिखाई दें, पौधे मुरझाने लगें या तने के पास सड़न नजर आए तो इसे छोड़ना नहीं चाहिए. शुरुआत के समय में समस्या पकड़ में आने पर किसान सही सलाह लेकर अपनी फसल को बचा सकता है.

पीला मोजेक जैसी बीमारी से रहें सावधान

सोयाबीन में पीला मोजेक एक गंभीर बीमारी होती है. इसमें पत्तियों पर पीले और हरे रंग के अलग-अलग हिस्से दिखाई देने लगते हैं. ICAR की सलाह के अनुसार यह बीमारी सफेद मक्खी के जरिए फैलती है. इसलिए खेत में सफेद मक्खी दिखाई देने पर ध्यान रखना जरूरी है. किसान को अपनी फसल में बीमारी के लक्षण दिखने पर स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए, ताकि सही बीमारी की पहचान जल्दी की जा सके.

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बीज उपचार से शुरुआत में ही करें बचाव

सोयाबीन की फसल को बीमारी से बचाने का काम बुवाई से पहले भी शुरू किया जाता है. बुवाई से पहले बीज इसके लिए खेत और फसल की स्थिति के अनुसार कृषि विशेषज्ञ द्वारा बताई गई दवा या जैविक उपचार का इस्तेमाल किया जा सकता है. बीज उपचार से शुरुआती स्तिथि में बीज और पौधों से जुड़ी कुछ बीमारियों का खतरा कम करने में मदद मिल जाती है. इसलिए किसान को बिना जानकारी के सीधे दवा नहीं डालना चाहिए.

खेत में पानी जमा न होने दें

सोयाबीन के खेत में जरूरत से ज्यादा पानी जमा रहना भी अच्छा नही होता है. लगातार गीली मिट्टी में पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचता है और कुछ बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है. इसलिए खेत में पानी निकलने की सही व्यवस्था रखना जरूरी है. वहीं दूसरी तरफ फूल आने और फलियां बनने के समय पानी की कमी भी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है. ICAR की सलाह के अनुसार इस समय फसल की जरूरत के हिसाब से सिंचाई करनी चाहिए.

बीमारी दिखे तो खुद से कोई भी दवा न डालें

किसान को पौधे में बीमारी दिखते ही कोई भी कीटनाशक या फफूंदनाशक अपनी तरफ से ज्यादा मात्रा में नहीं डालना चाहिए. अलग-अलग बीमारी और कीट के अलग- अलग कीटनाशक होते है. ICAR की सलाह में भी सोयाबीन की अलग समस्याओं के लिए अलग-अलग उपाय बताएं गए है. इसलिए पहले बीमारी की सही पहचान करना और फिर कीटनाशक डालना सही रहता है.

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