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‘हैप्पी फूड’ की खेती से सब हैं हैप्पी ! जानें कैसे किया किसानों ने कमाल

 ‘हैप्पी फूड’ की खेती से सब हैं हैप्पी ! जानें कैसे किया किसानों ने कमाल

मऊ: तमसा नदी का किनारा आमतौर पर खरबूज और तरबूज के उत्पादन के लिए जाना जाता है. लेकिन, सहरोज गांव के किसान अब परंपरागत खेती से हटकर केले की खेती पर जोर देने लगे हैं. इससे उनकी आमदनी भी बढ़ गई है और वे अन्य लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं.

सहरोज गांव के किसान केले की खेती कर प्रगतिशील किसानी में शामिल हो गए हैं. पहले तो उन्होंने सीमित खेतों में केले की खेती शुरू की लेकिन धीरे-धीरे दायरा बढ़ता गया. यहां अब 200 बीघे में केले की खेती होती है. बबलू राय ने 40 बीघे पर केले की खेती शुरू की है.

उन्होंने बताया कि इस खेती में लागत कम है और मुनाफा काफी ज्यादा है. इसके साथ ही कई अन्य लोग भी पारंपरिक खेती छोड़ कर धीरे-धीरे केले की तरफ आकर्षित हो रहे हैं. किसानों का कहना है कि एक मुर पर खर्च 10 हजार का आता है और मुनाफा 25 हजार का होता है.

एक बीघा जमीन पर करीब 150 पौधे लगाए जाते हैं और 25 से 30 क्विंटल केला इसमें उगता है. पौधों को छह फीट की दूरी पर लगाया जाता है. एक फसल तैयार होने में करीब 14 माह का समय लग जाता है. हालांकि, केले में कई तरह के रोग लगने की आशंका भी होती है.

इसके लिए इन पर समय-समय पर दवाओं का छिड़काव बहुत जरूरी है. साथ ही इनकी देखरेख पर भी ध्यान देना होता है. किसानों का कहना है कि इस फसल पर सरकार कोई न्यूनतम मूल्य निर्धारित नहीं करती है. इसलिए व्यापारी मनमाना रेट तय कर लेते हैं.

साथ ही किसानों का यह भी कहना है कि केले का बीज तो सरकार की ओर से अनुदान के तौर पर मिलता है लेकिन फसल पर रोग लग जाने की स्थिति में कोई मदद नहीं मिलती. स्थानीय कृषि अधिकारी भी कोई मदद नहीं कर पाते हैं. किसानों की मांग है कि इस तरफ भी सरकार को ध्यान देना चाहिए.

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