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#बिल_को_जानो: किसानों के लिए “आढ़तियों का अड़ंगा”, समझें APMC के ‘एकाधिकार’ की कहानी

 #बिल_को_जानो: किसानों के लिए “आढ़तियों का अड़ंगा”, समझें APMC के ‘एकाधिकार’ की कहानी

नई दिल्ली: जिन तीन कृषि कानूनों को लेकर दिल्ली के आसपास किसान यूनियनें धरने पर बैठी हैं उनमें से एक है “किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक 2020′ (The Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act, 2020). यही वह कानून हैं जिसमें APMC मंडियों के एकाधिकार को खत्म कर दिया है. इस कानून से पहले किसान अपनी फसलों को बस एपीएमसी मंडियों के जरिए ही बेच सकता था. लेकिन, अब वह स्वतंत्र होगा कि फसल मंडी में बेचे या किसी व्यापारी को या फिर किसी इंडीविजुअल को.

हालांकि, सबसे ज्यादा बवाल इसी प्रावधान को लेकर है. किसान यूनियनों का कहना है कि मार्केट खोल देने से किसान का शोषण होगा. लेकिन, सच्चाई यह भी है कि एपीएमसी मंडियां भी पिछले कुछ सालों में किसानों के शोषण का अड्डा बन चुकी हैं. किसान रिपोर्टर आपको बताएगा कि किस प्रकार एपीएमसी मंडियां किसानों की राह में अड़ंगा बनी हुई हैं. लेकिन, उससे पहले इसका थोड़ा सा इतिहास भी जान ही लेते हैं.

ब्रिटिश राज में ही पड़ गई थी नींव:

दरअसल ब्रिटिश राज से ही फसलों का रेग्यूलेशन शुरू हो गया था. सबसे पहले कपास एक ऐसी फसल थी जिसके लिए निर्धारित बाजार बनाए गए थे. उसके बाहर उन्हें बेचने की इजाजत नहीं थी. बेरार कॉटन एंड ग्रेन मार्केट एक्ट ऑफ 1887, उस समय लाया गया था. इसके बाद 1928 में रॉयल कमीशन ऑन एग्रीकल्चर बनाया गया जिसके कुछ रेकेमेंडेशन भी आए.

देशभर में किसानों के लिए खुशहाली आई थी:

जब साहूकारों का अत्याचार बढ़ा तो 1960 – 1970 के दशक में एपीएमसी एक्ट को गंभीरता के साथ लागू किया गया. 10 साल के अंतराल में लगभग सभी राज्यों में इसे लागू किया गया. शुरूआती दौर में किसानों को इससे खूब लाभ हुआ. लेकिन, 1991 के उदारीकरण के बाद देश में हर क्षेत्र का आर्थिक विकास हुआ लेकिन एपीएमसी एक्ट में कोई सुधार नहीं किया गया. इससे आर्थिक फासला बढ़ता गया.

कमीशन के लालच से शुरू हुई गड़बड़ी:

पहले कमीशन और फीस का अधिकार मंडियों को दिया गया ताकि उस पैसे से समितियां फसलों के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर बना सकेंगी. लेकिन, फीस और सेस के नाम पर वसूली तो बढ़ती गई लेकिन सुविधाएं लगातार कम होती गईं.

कमीशन एजेंट का अपना ‘एकक्षत्र राज’ बना:

इसके साथ ही कमीशन एजेंट या आढ़ती एकक्षत्र राज चलाने लगे. चूंकि किसानों के पास कोई अन्य विकल्प नहीं था, एजेंट मनमाना हो गए. तरह-तरह की फीस ने अलग-अलग मंडियों में फसलों के भिन्न रेट करने लगे. तमाम फीस के बाद भी किसानों की सुविधा नहीं बढ़ी.

बोली लगने से पहले ही सेटिंग का आरोप:

अब तो यह आरोप भी लगता है कि जो बोली मंडियों में लगाई जाती है उसकी सेटिंग पहले से ही हो चुकी होती है. ऐसे में किसान को जरूर लगता है कि बोली लग रही है लेकिन रेट पहले से ही फिक्स होते हैं. जिन पर एमएसपी है उन फसलों पर भी औऱ जिसपर नहीं है उनके भी मनमाने रेट होते हैं.

पहले भी हुई थी समाधान की कोशिश:

मौजूदा कानून से पहले भी समाधान करने की कोशिश हुई थी. सन 2003 में तत्कालीन सरकार ने मॉडल एपीएमसी एक्ट का प्रावधान किया था. लेकिन, ज्यादातर राज्यों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. चूंकि कृषि संविधान के स्टेट लिस्ट में भी है ऐसे में इसपर गफलत बनी ही रही.

मौजूदा कानून से टूटेगी मोनोपोली:

ताजा कानून “किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) विधेयक 2020” के जरिए किसानों को विकल्प देने की कोशिश की गई है. जो बाजार किसानों के लिए दशकों से बंद था अब उसे खोल दिया गया है. कुछ शंकाएं जाहिर जरूर की गई हैं लेकिन सरकार इसमें संशोधन करने को भी तैयार है. साथ ह यह भी साफ है कि एपीएमसी मंडियां बंद नहीं होंगी.

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