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#बिल_को_जानो : किसानों की दर्दनाक दास्तां, जानें कैसे होता रहा है अन्नदाता संग अन्याय

 #बिल_को_जानो :  किसानों की दर्दनाक दास्तां, जानें कैसे होता रहा है अन्नदाता संग अन्याय

नई दिल्ली: भारत एक कृषि प्रधान देश है यह हम सब बचपन से पढ़ते आए हैं. हमारे देश के 70 प्रतिशत से ज्यादा आबादी कृषि पर ही निर्भर है. कृषि देश के जीडीपी में कुल 3 प्रतिशत का योगदान भी करती है. लेकिन, जब किसानों की हालत को झांक कर आप देखेंगे तो आपके होश उड़ जाएंगे.

किसान दशकों से अलग-अलग शोषण का शिकार होता आया है. उसे कभी भी सही न्याय नहीं मिला और न ही उसके मेहनत का सही मुआवजा. अगर हम थोड़ा पहले चलें तो देखेंगे कि साहूकारों ने किसानों को जीने नहीं दिया, इसके बाद वर्तमान समय में ‘आढ़ती का आतंक’ फैला हुआ है.

हजारों की संख्या में किसान इस देश में इन्हीं वजहों के कारण अपनी जान दे चुके हैं. कुछ ने तो खेती से मुंह मोड़ लिया और शहरों में मजदूरी आदि करने लगे. किसानों से किसानी ही छीन ली गई. उसके आंसू अब तक नहीं सूखे हैं.

यही कारण हैं कि देश में कृषि सुधारों की जरूरत समय की मांग है. तभी जाकर हमारा किसान न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ा हो पाएगा बल्कि दुनिया के, खासकर चीन और साउथ कोरिया के किसानों को टक्कर दे पाएगा. पर यह तभी संभव होगा जब हम परंपरागत नियमों से आगे बढ़ेंगे.

इसी को लेकर किसान रिपोर्टर ने 13 फरवरी से 27 फरवरी तक एक विशेष अभियान #BillKoJano / #बिल_को_जानो शुरू किया है जिसके तहत ताजा तीन कृषि बिलों को लेकर निष्पक्ष ढंग से जानकारियां दी जाएंगी. साथ ही हम चर्चा करेंगे कि किसानों की मौजूदा हालत देश में क्या है. यह जानकारी किसानों के लिए तो महत्वपूर्ण होगी ही साथ ही साधारण जनता के जानने लायक भी कई महत्वपूर्ण जानकारियां होंगी.

साहूकार ने किया था सत्यानाश:

हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि साहूकारों ने भारतीय किसानों का किस कदर शोषण किया है. साहूकार सादे कागज पर किसानों से अंगूठा लगवा लेते थे. इसके बाद जब फसल तैयार होती थी तो सूद के तौर पर उनकी फसल ले लेते थे और मूल के तौर पर जमीन पर भी कब्जे होते थे. किसान भुखमरी के लिए मजबूर होता था.

1960-1970 के बीच शुरू हुए थे सुधार:

किसानों की दुर्गतियों को देखते हुए एपीएमसी एक्ट (Agriculture Produce Marketing [Regulation] Act) का प्रावधान किया गया. सन 1960 से लेकर 1970 के बीच अधिकतर राज्यों ने इसे लागू किया. इसके बाद अब कोई साहूकार किसानों से सीधे फसल खरीद ही नहीं सकता था. किसान सीधे एपीएमसी की मंडियों में आता था और कमीशन एजेंट (आढ़तियों) के जरिए सामान बेचता था.

आढ़तियों ने भी शुरू किया ‘अत्याचार’:

60 के दशक में यह एक्ट किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं था. उनको फायदा होना भी शुरू हुआ था लेकिन यहां भी खेल शुरू हो गए. आढ़तियों ने आने वाले समय में अपना असर इतना बढ़ा लिया कि वे भी किसानों का शोषण करने लगे. तमाम नियमों और हालातों का हवाला देकर किसानों का फिर से शोषण शुरू हो गया. हालांकि यह साहूकारों वाले समय से बेहतर ही माना जा सकता है.

इसे देखते हुए 21वीं सदी में कुछ सरकारों ने अपने स्तर पर कदम उठाएं और फिर अब केंद्र सरकार एक बड़े बदलाव की तरफ इस पूरी व्यवस्था को लेकर जा रही है.

अब बने रहिए किसान रिपोर्टर के साथ … सटीक जानकारियों वाली अगली पोस्ट का इंतजार करिए …

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