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पराली: अब प्रदूषण की जगह पैसा, पढ़िए ये खबर

 पराली: अब प्रदूषण की जगह पैसा, पढ़िए ये खबर

नई दिल्ली: देश के कई शहरों में वायु प्रदूषण (Air Pollution) का स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है और खेतों में पराली (Stubble)  जलाना इसके पीछे प्रमुख कारण है. धान और गेहूं की कटाई के बाद बचे पुआल, जिसे पराली कहते हैं. किसान इसे खेत में ही जला देते हैं और इससे वायू प्रदूषण के साथ ब्लैक कार्बन भी बढ़ता है, जो ग्लोबल वार्मिग भी बढ़ाता है.

पराली से कर सकते हैं कमाई
किसान पराली (Stubble) को खेतों में ना जलाकर, इसे अपनी आमदनी का एक जरिया बना सकते हैं. यह मुमकिन है पराली प्रबंधन के जरिए उसे फ्यूल या खाद बनाकर. पराली प्रबंधन में सरकार भी आर्थिक मदद करती है. सरकार की तरफ से लगातार किसानों को इस बारे में जागरूक किया जा रहा है कि वे पराली अपने खेतों में न चलाए, बल्कि उसका सही से निपटान करें.

कैसे कर सकते हैं पराली से कमाई?
पराली का इस्तेमाल गैस प्लांट बनाने में किया जा सकता है, जिससे खाना बनाना और गाड़ी चलाना संभव है. एक टन पराली में 5.50 किलो नाइट्रोजन, 2.3 किलो फॉस्फोरस, 1.30 किलो सल्फर और 25 किलो पोटैशियम होता है. पराली से गैस के अलावा खाद भी बन सकती है, जिसकी बाजार में कीमत 5,000 रुपए प्रति टन है. पराली प्रबंधन के जरिए किसान खाद और गैस बनाकर आमदनी बढ़ा सकता है.

किस तरह होता है पराली का निपटान
1. धान या गेहूं के बचे हिस्से को खेतों में जोत दिया जाता है और बाद में गलकर खाद का काम करते हैं.
2. पराली को मिट्टी और ईट के बने छोटे से घर में भरकर जलाया जाता है और जमा हुई कालिख को मिट्टी में मिलाने से उर्वरा शक्ति बढ़ती है. इस तरह प्रदूषण भी नहीं फैलता है.
3. तीसरा तरीका है पराली से बने पेलेट थर्मल पावर प्लांट में कोयले के साथ जलाए जाते हैं.

पराली प्रबंधन में सरकार कैसे करती है मदद
सरकार पराली प्रबंधन की मशीनें खरीदने के लिए आर्थिक रूप से मदद करती है. सरकार द्वारा मशीनों की खरीदारी पर 80 फीसदी तक रकम दी जाती है. इसके अलावा कई राज्य सरकारों द्वारा कृषि अवशेष न जलाने वाले किसानों को इनाम भी दिया जाता है.

कैसे मिलेंगे पैसे
संबंधित राज्य सरकारें जिला स्तरीय कार्यकारी समितियों (डीएलईसी) के माध्यम से विभिन्न लाभार्थियों की पहचान करती हैं और फिर आधार/यूआईडी नंबर तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से आर्थिक मदद की जाती है. इसके लिए किसानों को अपने जिला के कार्यकारी समितियों से संपर्क करना होगा.

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