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सब्जी से करोड़ों की कमाई, IIM गोल्ड मेडलिस्ट का कमाल

 सब्जी  से करोड़ों की कमाई, IIM गोल्ड मेडलिस्ट का कमाल

नई दिल्ली: कहते है कोई काम छोटा नहीं होता और पक्के इरादे के साथ किया जाए तो छोटे काम को भी बड़ा बनाया जा सकता है. ऐसा ही कुछ कर दिखाया है बिहार के नालंदा जिले के मोहम्मदपुर गांव के रहने वाले कौशलेंद्र ने, जिन्होंने अपनी सूझबूझ और मेहनत से सब्जी बेचकर करोड़ों की कमाई कर रहे हैं.

IIM टॉपर रह चुके हैं  कौशलेंद्र
कौशलेंद्र ने 10वीं तक की पढ़ाई सरकारी संस्था जवाहर नवोदय विद्यालय से की है, इसके बाद उन्होंने 12वीं पटना के साइंस कॉलेज से की और गुजरात के इंडियन कॉउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च से एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग की. इंजीनियरिंग करने के बाद कौशलेंद्र ने अहमदाबाद आईआईएम (IIM) से एमबीए पूरी की, जहां उन्होंने टॉप किया.

पहले दिन हुई थी 22 रुपये की कमाई
आईआईएम अहमदाबाद से गोल्ड मेडल जीत कर कौशलेंद्र ने किसी बड़ी कंपनी में काम करने की जगह पटना लौट आए और सब्जी बेचने का काम करने लगे, जिसके बाद लोगों ने उनका मजाक भी उड़ाया था. जब कौशलेंद्र ने सब्जी बेजने का काम शुरू किया तो पहले दिन उनकी कमाई सिर्फ 2 रुपये हुई थी, इसके बावजू वह निराश नहीं हुए और जमकर मेहनत की.

22 रुपये से 5 करोड़ तक का सफर
पहले दिन 22 रुपये की कमाई करने वाले कौशलेंद्र का टर्नओवर 8 सालों में 5 करोड़ रुपये से ऊपर हो गया, जो लगातार बढ़ता जा रहा है. दरअसल, साल 2008 में उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर सब्जियों के ब्रांड समृद्धि तथा कौशल्या फाउंडेशन के नाम से एक संस्था की स्थापना की. समृद्धि का पहला सेंटर कृष्णानगर में बनाया गया और यहां सब्जियों को छांटने के बाद उनकी पैकिंग व बारकोडिंग की जाती थी. इसके बाद इन्हें समृद्धि ब्रांड के नाम से बेचा जाता था. हालांकि यह इतना आसान नहीं था.

ठेले पर सब्जियां बेचनी शुरू की

कौशलेंद्र ने शुरुआत में ठेले पर सब्जियां बेचनी शुरू की, लेकिन या कोई आम ठेला नहीं था, बल्कि इसे एसी ग्रीन कार्ट कहा जाता है जो कि फाइबर से बना होता है. 200 किलो तक सब्जियां स्टोर करने वाले इस वातानुकूलित ठेले में पांच से छह दिन तक सब्जियां ताजी रहती हैं. जल्द ही उन्होंने जैविक खेतों से उगने वाली सब्जियां भी बेचनी शुरू कर दी और कुछ अलग करने की वजह से ठेले ने ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित किया.

शहर भर में उनके 50 ठेले चलने लगे

इसके बाद उन्होंन बिजनेस बढ़ाया और शहर भर में उनके 50 ठेले चलने लगे. ठेलों की लोकप्रियता बढ़ते ही वह इन हाई फाई ठेलों पर विज्ञापन देने लगे और उनको अच्छी खासी आमदनी होने लगी. और देखते ही देखते ठेलो की लागत उन्हें वापस मिल गई. आज कौशलेंद्र के कारण ही 22 हजार से भी ज्यादा किसानों को उनकी फसल का सही दाम मिल रहा है.

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