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#बिल_को_जानो: MSP- बड़े रहस्य हैं इस राह में…आप जो कुछ जानना चाहते हैं यहां मिलेगा

 #बिल_को_जानो: MSP- बड़े रहस्य हैं इस राह में…आप जो कुछ जानना चाहते हैं यहां मिलेगा

नई दिल्ली: कृषि कानूनों को लेकर आंदोलन चल रहा है. इस बीच एक नाम बार-बार लोगों को सुनने में आ रहा है और वह है न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP). वैसे तो इसके बारे में बहुत कुछ लोगों को पता चल रहा है लेकिन फिर ऐसी कई बातें हैं जिसका जिक्र सामने नहीं आता है. तो आज किसान रिपोर्टर आपको बताने जा रहा है एमएसपी का हर पक्ष… थोड़ा समय दीजिए और गौर से पढ़िएगा…

शुरू करते हैं इतिहास से …

देश सन 1964-65 में बहुत ही कठीन दौर से गुजर रहा था. उसी समय अकाल ने तांडव शुरू कर दिया. अमेरिका, अनाज दे रहा था लेकिन बहुत ही नखरों के साथ. इसके बाद तत्कालीन सरकार ने किसानों को ज्यादा से ज्यादा अनाज उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया. ‘झा समिति’ की सिफारिश पर पहली बार 1966 में गेंहू पर MSP दी गई.

MSP का असर भी गजब दिखा …

एमएसपी से उत्साहित किसानों ने खूब फसल तैयार की. पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिंचाई के अच्छे साधन थे इसलिए यहां खेत लहलहा गए. किसानों को इस बात की चिंता भी नहीं थी कि उन्हें लागत भी मिलेगी या नहीं. इतनी खेती हुई कि 70 के दशक के अंत तक हमारा देश खाद्यान के मामले में आत्मनिर्भर हो गया. आज हम खाद्यान के निर्यातक भी हैं.

MSP जरूरी क्यों है सरकार के लिए …

सरकार के लिए MSP की जरूरत इसलिए है क्योंकि इसे अनाज चाहिए. भारत में दुनिया की सबसे बड़ी फूड सिक्योरिटी योजना चलती है. जिसके तहत 80 करोड़ से ज्यादा भारतियों को पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS) के जरिए अनाज उपलब्ध कराया जाता है. मिड डे मील और गर्भवती महिलाओं की योजना के लिए अनाज की जरूरत होती है. यह सब MSP के जरिए FCI किसानों से खरीद कर गोदामों में रखती है.

कैसे तय होता है MSP …

अब जाहिर सी बात है कि यह फसलों का मूल्य है तो इसे तय भी किया जाता होगा. तो साल में दो बार रबी और खरीफ के दौरान फसल बोने से साथ ही MSP तय कर ली जाती है. कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट्स एंड प्राइसेस (CACP) 23 फसलों के लिए एमएसपी की सिफारिश करती है. इसमें 14 खरीफ और 6 रबी की फसलें होती हैं. इसके अलावा गन्ना, जूट और गरी भी शामिल है. फसल की लागत के साथ ही उसकी मांग व आपूर्ति की परिस्थितयां, देश-दुनिया में प्राइस ट्रेंड आदि कई बातों को ध्यान में रखकर एमएसपी तय होता है.

सिर्फ 6 प्रतिशत फसलें ही बिकती हैं MSP पर…

आपको आश्चर्य़ होगा कि देश में सिर्फ 6 प्रतिशत फसलें ही एमएसपी पर बिकती हैं. इसके अवाला सब बाजार रेट पर निकलता है. साथ ही गन्ना सहित 23 फसलों पर एमएसपी लागू तो है लेकिन गेहूं और चावल खरीदने की ही गारंटी सरकार की है. यानि एफसीआई सिर्फ गेहूं और चावल खरीदती है. बाकी सब एपीएमसी मंडियों में भी बेचना होता है. ऐसे में 20 बची बाकी फसलें (गन्ने को छोड़) कमीशन एजेंट और व्यापारियों के हवाले होती हैं.

पंजाब-हरियाणा का MSP कनेक्शन…

जैसे की पहले ही लिख चुके हैं कि हरित क्रांति के दौरान पंजाब-हरियाणा फसल उगाने में अग्रणी रहे औऱ एमएसपी का लाभ भी उन्हें मिला. यह लाभ अब तक यहां के किसानों को जारी है. अगर आप आंकड़ों को देखें तो पंजाब हरियाणा में उगने वाले चावल का 88% हिस्सा और गेहूं का 70% हिस्सा MSP पर बिक जाता है जो कि दूसरे राज्यों में काफी कम है. तो एक तरह से कह सकते हैं कि इन दो राज्यों में कृषि का अर्थशास्त्र MSP पर ही टिका हुआ है.

MSP पर ताजा विवाद और मांग…

दरअसल इससे पहले भी कभी भारत में MSP कानून के तहत नहीं था. इसे प्रशासनिक नोटिफिकेशन के जरिए ही लागू करते हैं. यूनियनों की मांग है कि ताजा कृषि कानूनों में MSP को जगह मिलनी चाहिए. क्योंकि इन कानूनों में कहीं भी MSP का जिक्र नहीं तो किसानों को डर है कि इसे समाप्त न कर दिया जाए. जबकि, सरकार का दावा है कि MSP को कुछ नहीं हो रहा वह जारी रहेगी.

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