देश के किसानों को सूखे, बाढ़ और बेमौसम बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाओं के आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना इन दिनों चर्चा में है. हाल ही में आए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दो सालों में करीब 73 लाख किसानों ने इस योजना से दूरी बना ली है. यह आंकड़ा बेहद चौंकाने वाला है, क्योंकि एक तरफ मौसम में तेजी से बदलाव आ रहे हैं और दूसरी तरफ किसान फसल बीमा को छोड़ रहे हैं. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और इस पूरी योजना में क्लेम, प्रीमियम और नुकसान का अंदाजा कैसे लगाया जाता है. आइए जानते है इन सब सवालों के जवाब.
योजना छोड़ने की मुख्य वजह
विशेषज्ञों और किसानों के अनुसार, इस योजना को छोड़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण क्लेम मिलने में होने वाली भारी देरी और जटिल प्रक्रिया है. कई बार आपदा के बाद फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाती है, लेकिन बीमा कंपनियों के नियम और सर्वे के तरीकों के कारण किसानों को या तो क्लेम बहुत कम मिलता है या खारिज हो जाता है. इसके अलावा, तकनीकी खामियों, बैंक स्तर पर अनिवार्य प्रीमियम कटने के बाद भी समय पर डेटा अपडेट न होने और शिकायत निवारण तंत्र की सुस्ती के चलते किसानों का भरोसा इस योजना से कम हुआ है.
जमीन के साइज के हिसाब से कितना लगता है प्रीमियम?
इस योजना के तहत प्रीमियम की दरें बहुत कम रखी गई हैं ताकि छोटे से छोटे किसान पर भी बोझ न पड़े. प्रीमियम की राशि जमीन के साइज एकड़ या हेक्टेयर और फसल के प्रकार पर निर्भर करती है. साथ ही इस योजना के तहत खरीफ की फसल के लिए किसानों को कुल बीमा राशि का केवल 2% प्रीमियम देना होता है. वहीं रबी की फसल में केवल 1.5% प्रीमियम का प्रावधान है. इसके अलावा बागवानी और व्यावसायिक फसलें जैसे गन्ना, कपास के लिए यह प्रीमियम बढ़कर 5% हो जाता है.
यह भी पढ़ें: मिर्च के पौधे में ज्यादा फल चाहिए? न करें ये 5 गलतियां
किन तरीकों से लगाया जाता है नुकसान का अंदाजा?
फसल के नुकसान का आकलन करने के लिए मुख्य रूप से दो तरीके अपनाए जाते हैं.
क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट- यह सबसे पारंपरिक और मुख्य तरीका है. इसके तहत राजस्व और कृषि विभाग के अधिकारी एक तय इलाके के कुछ खेतों को चुनते हैं. वहां एक छोटे हिस्से की फसल को काटकर उसका वजन किया जाता है. इसकी तुलना पिछले 7 सालों के औसत उत्पादन से की जाती है. अगर इस बार उत्पादन कम बैठता है, तो पूरे इलाके को नुकसान में माना जाता है.
आधुनिक तकनीक और ड्रोन- अब विवादों को कम करने और पारदर्शिता लाने के लिए सैटेलाइट तस्वीरों और ड्रोन कैमरों का सहारा लिया जा रहा है. इससे बाढ़ या सूखे से प्रभावित क्षेत्रों का सटीक और तुरंत नक्शा तैयार हो जाता है.
कैसे कैलकुलेट होता है फसल बीमा का क्लेम?
क्लेम के गणित को समझने के लिए बीमा कंपनियां एक सीधा तरीका अपनाती हैं. सबसे पहले कंपनी उस इलाके की गारंटीशुदा उपज तय करती है. इसके लिए उस क्षेत्र के पिछले 7 साल के रिकॉर्ड को देखा जाता है. उनमें से सबसे अच्छे 5 सालों की औसत पैदावार का एक तय प्रतिशत जैसे 70% या 80% गारंटी मान लिया जाता है. इसके बाद सरकारी सर्वे के जरिए इस साल की वास्तविक उपज निकाली जाती है, यानी आपदा के बाद असल में कितनी फसल बची.
अब यदि इस साल की वास्तविक पैदावार, सरकार की तय की गई गारंटीशुदा पैदावार से कम निकलती है, तो नुकसान की गणना की जाती है. पैदावार में जितने प्रतिशत की कमी आती है, ठीक उतने ही प्रतिशत का क्लेम किसान को उसकी कुल बीमा राशि पर दे दिया जाता है. उदाहरण के लिए, अगर पैदावार में 40% की कमी आई है, तो किसान को उसकी कुल तय बीमा राशि का 40% हिस्सा क्लेम के रूप में सीधे उसके बैंक खाते में भेज दिया जाता है.
यह भी पढ़ें: मिर्च के पत्ते मुड़ रहे हैं? कीड़ा है या पानी की कमी
