देश में इन दिनों प्याज की कीमतें बढ़ने को लेकर लोग परेशान है. जब भी प्याज के दाम चढ़ते या गिरते हैं. तो सबकी नजरें सीधे महाराष्ट्र की ओर जाती हैं. क्योंकि भारत की कुल प्याज खपत का एक बहुत बड़ा हिस्सा अकेले महाराष्ट्र से ही पूरा होता है. आंकड़ों के लिहाज से बात करें तो देश में पहुंचने वाला हर तीसरा प्याज इसी राज्य की जमीन से निकलकर आता है. चाहे दिल्ली हो, कोलकाता हो या दक्षिण भारत का कोई शहर, हर जगह महाराष्ट्र का प्याज छाया रहता है.
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है? पूरे देश में इतने सारे कृषि प्रधान राज्य होने के बावजूद प्याज की सबसे ज्यादा पैदावार सिर्फ महाराष्ट्र में ही क्यों दर्ज की जाती है? क्या यहां का मौसम कुछ अलग है या फिर यहां की मिट्टी में कोई ऐसा खास जादू है जो प्याज की फसल को एकदम बढ़िया बैठता है? चलिए आपको बताते हैं कि महाराष्ट्र प्याज की राजधानी कैसे बना और क्या है यहां कि मिट्टी में खास.
प्याज के लिए यहां की मिट्टी क्यों मानी जाती है बेस्ट?
महाराष्ट्र के पश्चिमी और मध्य इलाकों में पाई जाने वाली दक्कन के पठार की काली मिट्टी यानी ब्लैक कॉटन सॉइल प्याज की खेती के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. इस मिट्टी में क्ले और जरूरी मिनरल्स का एकदम परफेक्ट बैलेंस होता है जो प्याज की जड़ों और गांठ की ग्रोथ के लिए बेहद जरूरी है. काली मिट्टी की सबसे बड़ी खूबी इसकी नमी सोखने और उसे लंबे समय तक बनाए रखने की बढ़िया क्षमता है.
प्याज एक ऐसी फसल है जिसे जमीन के अंदर लगातार हल्की नमी चाहिए होती है. लेकिन पानी का जमाव बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होता. यहां की मिट्टी में पोटाश, मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे जरूरी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं. यही पोषक तत्व प्याज को सही गोलाई, उसका गहरा गुलाबी-लाल रंग, तीखा स्वाद और लंबे समय तक सड़ने से बचाने वाली मोटी बाहरी परत देते हैं.

मौसम का डबल फायदा
मिट्टी के अलावा महाराष्ट्र की आबोहवा प्याज की खेती के लिए सबसे सही मानी जाती है. यहां का मौसम न तो बहुत ज्यादा ठंडा होता है और न ही बहुत ज्यादा गीला. राज्य के कई इलाके सेमी-एरिड जोन में आते हैं, जहां धूप अच्छी खिलती है और हवा में नमी का लेवल बैलेंस्ड रहता है. इस मौसम का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां के किसान साल में एक नहीं बल्कि तीन अलग-अलग सीजन में प्याज उगाते हैं.
खरीफ, लेट खरीफ और रबी. रबी सीजन की फसल जो कि सर्दियों में बोई जाती है और गर्मियों में काटी जाती है. सबसे ज्यादा मजबूत होती है. इस समय मिलने वाली ड्राई और हल्की ठंडी हवा प्याज को ठोस बनाती है. पूरे देश में जब बाकी जगहों पर खेती रुकी होती है. तब भी महाराष्ट्र के खेतों में प्याज की कटाई और बुवाई का काम लगातार चलता रहता है.
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एशिया की सबसे बड़ी मंडी
महाराष्ट्र को प्याज का देश में नंबर बनाने में सिर्फ नेचर का ही हाथ नहीं है. बल्कि यहां का ट्रेड नेटवर्क भी बहुत बड़ा रोल निभाता है. नासिक जिले का लासलगांव सिर्फ भारत ही नहीं पूरे एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी माना जाता है. यहां पीढ़ियों से किसान पारंपरिक तरीकों के साथ मॉडर्न ड्रिप इरिगेशन और वैज्ञानिक तरीकों को मिलाकर खेती कर रहे हैं.

इसके अलावा यहां के किसानों ने अपने खेतों पर देसी कांदा चाळ यानी नेचुरल स्टोरेज स्ट्रक्चर बनाने की शानदार कला सीखी हुई है. इससे वह रबी प्याज को बिना सड़ाए 5 से 6 महीने तक सुरक्षित स्टोर कर लेते हैं. इस मजबूत स्टोरेज कैपेसिटी और देश के कोने-कोने तक फैले ट्रांसपोर्ट नेटवर्क की बदौलत महाराष्ट्र साल के 12 महीने पूरे देश की मंडियों में प्याज की सप्लाई को कंट्रोल करने की ताकत रखता है.
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