आज के समय में खेती के लिए जमीन की कमी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है. खासकर शहरों में जहां लोगों के पास खुली जमीन नहीं होती, वहां सब्जियां उगाना मुश्किल लगता है. लेकिन आधुनिक कृषि तकनीक ने इस समस्या का समाधान काफी हद तक आसान कर दिया है. हाइड्रोपोनिक्स ऐसी तकनीक है, जिसमें पौधों को उगाने के लिए मिट्टी की जरूरत नहीं पड़ती. इसमें पौधों को पानी और पोषक तत्वों के घोल की मदद से विकसित किया जाता है.
ऐसे काम करती है हाइड्रोपोनिक्स तकनीक
हाइड्रोपोनिक्स एक ऐसी खेती प्रणाली है, जिसमें पौधों की जड़ों को मिट्टी के बजाय पोषक तत्वों से भरपूर पानी उपलब्ध कराया जाता है. पौधों को सहारा देने के लिए नारियल का बुरादा, परलाइट, वर्मीकुलाइट या अन्य माध्यमों का इस्तेमाल किया जाता है. पौधे की जड़ों को पानी में मौजद नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम और अन्य जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं. इसी वजह से पौधे मिट्टी के बिना भी तेजी से बढ़ पाते हैं.
हाइड्रोपोनिक्स सिस्टम करते हैं तैयार
सबसे पहले हाइड्रोपोनिक्स सिस्टम तैयार किया जाता है. इसमें पाइप, टैंक या विशेष कंटेनर का इस्तेमाल किया जाता है. पौधों को नेट पॉट या दूसरे सपोर्ट में लगाया जाता है. इसके बाद पोषक तत्वों वाला पानी जड़ों तक पहुंचाया जाता है. सिस्टम के अनुसार पानी लगातार या निश्चित अंतराल पर जड़ों तक पहुंचता रहता है. पानी का pH और पोषक तत्वों की मात्रा नियंत्रित करना बेहद जरूर होता है. जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे, इसके लिए कई प्रणालियों में एयर पंप का भी इस्तेमाल किया जाता है.
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कौन-कौन सी सब्जियां उगा सकते हैं?
हाइड्रोपोनिक्स से कई प्रकार की सब्जियां और हरी पत्तेदार फसलें उगाई जा सकती हैं. लेट्यूस, पालक, धनिया, मेथी, और अन्य पत्तेदार सब्जियां इसके लिए काफी लोकप्रिय हैं. इसके अलावा टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च और स्ट्रॉबेरी जैसी फसलों को भी उचित सिस्टम और देखभाल के साथ उगाया जा सकता है.
हाइड्रोपोनिक्स के फायदे
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें पारंपरिक खेती की तुलना में बहुत कम जमीन की जरूरत पड़ती है. इसे घर की छत, बालकनी, ग्रीनहाउस या सीमित जगह में भी अपनाया जा सकता है. इसके अलावा पानी का दोबारा इस्तेमाल संभव होने के कारण कुछ हाइड्रोपोनिक सिस्टम में पानी की बचत होती है. पौधों को पोषक तत्व सीधे जड़ों तक मिलने से उनकी वृद्धि अच्छी होती है. नियंत्रित वातावरण में खेती करने पर मौसम से जुड़े कुछ जोखिम भी कम किए जा सकते हैं.
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