किसान खेतों में खूब मेहनत करते हैं. फसल लगाते हैं और उसके रखरखाव के केमिकल भरे कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं. जिससे कि उनकी फसल खराब न हो उसमें कीटों का हमला न हो. और उनकी आमदनी प्रभावित न हो. लेकिन अनजाने में बहुत से किसान बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं. हाल ही में आई एक इंटरनेशनल रिसर्च स्टडी ने ऐसा खुलासा किया है जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के करीब 46 फीसदी किसान और खेतिहर मजदूर हर साल अनजाने में जहरीले कीटनाशकों के सीधे जहर का शिकार हो रहे हैं. यह आंकड़ा करीब 38 से 40 करोड़ मामलों का बैठता है. फसल को कीड़ों से बचाने के चक्कर में किसान जिस केमिकल का छिड़काव करते हैं. वही धीमे जहर की तरह उनकी सांसों और शरीर में घुल रहा है. बिना किसी सेफ्टी गियर के कीटनाशक छिड़कना किसानों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहा है.
खेतों में घुटती किसानों की सांसें
फ्रंटियर्स इन पब्लिक हेल्थ जर्नल में पब्लिश हुई इस स्टडी के आंकड़े बताते हैं कि कीटनाशकों का यह जानलेवा असर सबसे ज्यादा एशियाई और अफ्रीकी देशों में देखा जा रहा है. भारत जैसे बड़े कृषि प्रधान देश में हालात और भी ज्यादा सेंसटिव हैं. रिपोर्ट में सामने आया है कि दुनिया भर में पेस्टिसाइड पॉइजनिंग से होने वाली मौतों में एक बड़ा हिस्सा अकेले भारत से जुड़ा है. खेतों में स्प्रे करते समय किसानों के पास न तो कोई ढंग का मास्क होता है और न ही दस्ताने.
तेज धूप में पीठ पर भारी टंकी लादकर जब किसान केमिकल छिड़कते हैं. तो हवा के रुख के साथ वह केमिकल उनकी त्वचा और सांस के रास्ते सीधे फेफड़ों में उतर जाता है. इसके तुरंत बाद चक्कर आना, आंखों में भयानक जलन, उल्टी और सिरदर्द जैसी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं. ज्यादातर किसान इसे मामूली थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. जो आगे चलकर कैंसर, सांस की गंभीर बीमारी और नर्वस सिस्टम डैमेज जैसी जानलेवा बीमारियों का रूप ले लेता है.

मेडिकल सुविधाओं का भारी अभाव
इस पूरे संकट में सबसे बड़ी बात यह है कि ज्यादातर मामले तो कभी अस्पतालों के रिकॉर्ड तक पहुंच ही नहीं पाते. ग्रामीण इलाकों में आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर पेस्टिसाइड टॉक्सिसिटी से निपटने के पुख्ता इंतजाम नहीं होते. जब किसी किसान को कीटनाशक के असर से बेचैनी होती है. तो वह झोलाछाप डॉक्टरों से दवा लेकर काम चला लेता है.
इसके अलावा कंपनियों द्वारा बोतलों पर लिखे सेफ्टी निर्देश इतने बारीक और तकनीकी अंग्रेजी में होते हैं कि आम किसान उन्हें समझ ही नहीं पाता. दुकानदार भी मुनाफा कमाने के चक्कर में अंधाधुंध कॉकटेल स्प्रे की सलाह दे देते हैं. कई बार तो किसान कीड़े जल्दी मारने की होड़ में तय मात्रा से दोगुना केमिकल पानी में घोल देते हैं. जानकारी की इसी कमी और सुरक्षा साधनों की गैर-मौजूदगी ने हमारे खेतों को केमिकल के खतरनाक गैस चैंबर में तब्दील कर दिया है जहां काम करना जान हथेली पर रखने जैसा है.
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कैसे बचा जा सकता है इस खतरे से?
अब सवाल आता है कि इस खतरे से किसानों को बचाने के लिए सख्त कदम उठाए जाने जरूरी है. अगर किसानों को इससे बचाना है तो सबसे पहले बेहद खतरनाक कैटेगरी वाले कीटनाशकों के खुले बाजार में बिकने पर पूरी तरह बंद करना होगा. सरकार और कृषि वैज्ञानिकों किसानों को पर्सनल प्रोटेक्टिव किट के इस्तेमाल की ट्रेनिंग देनी होगी.

इसके साथ ही प्राकृतिक और ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देना जरूरी हो चुका है. जिससे केमिकल पर निर्भरता कम हो सके. और किसानों को भी यह बात समझनी होगी कि फसल की थोड़ी सी ज्यादा पैदावार उनकी अपनी जान और परिवार से ज्यादा कीमती नहीं हो सकती. अगर समय रहते सही कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वक्त में यह आंकड़ा और बढ़ता नजर आ सकता है.
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