मसालों की खेती हमेशा से एक प्रॉफिट वाला बिजनेस रहा है. किसान हल्दी, धनिया, जीरा, अदरक और मिर्च जैसी फसलें उगाकर जबरदस्त कमाई कर सकते हैं. सही फसल, बाजार और खेती का तरीका मुनाफे में बड़ा अंतर डालता है. ऐसे में किसान कुछ आसान तरीकों को अपना कर कर सकते हैं अच्छी कमाई.
बता दें, भारत को दुनिया के बड़े स्पाइस प्रोड्यूसर्स और एक्सपोर्टर्स में गिना जाता है. देश में हल्दी, जीरा, धनिया, मिर्च, अदरक और काली मिर्च जैसे कई मसालों की खेती होती है. स्पाइसेज बोर्ड के अनुसार, 2025-26 में भारत ने 17.34 लाख टन मसाले और मसाला उत्पाद एक्सपोर्ट किए, जिनकी कीमत करीब 39,140 करोड़ रुपये रही. ऐसे में किसान अगर स्थानीय मांग और बाजार भाव को ध्यान में रखकर मसालों की खेती करें तो खेती से आमदनी बढ़ाने का एक विकल्प मिल सकता है.
हल्दी की खेती से शुरू कर सकते हैं किसान
हल्दी भारत में इस्तेमाल होने वाला प्रमुख मसाला है. इसकी खेती के लिए खेत में अच्छा ड्रेनेज होना जरूरी है, क्योंकि खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहने से फसल को नुकसान पहुंचता है. इसकी खेती आमतौर पर राइजोम यानी गांठ से की जाती है. आईसीएआर के अनुसार, आईआईएसआर प्रगति जैसी हल्दी की इम्प्रूव्ड वैरायटी की औसत यील्ड करीब 38 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है. वास्तविक उत्पादन मिट्टी, मौसम, सिंचाई और खेती के तरीके पर निर्भर करता है.हल्दी की फसल तैयार होने के बाद इसकी खुदाई की जाती है. इसके बाद गांठों को साफ करके उबालने, सुखाने और पॉलिश करने की प्रक्रिया की जाती है. अच्छी क्वालिटी मिलने पर किसान इसे स्थानीय बाजार के अलावा प्रोसेसिंग और मसाला कारोबार से जुड़े खरीदारों को भी बेच सकते हैं.
जीरा और धनिया भी हैं कमाई का विकल्प
जीरा और धनिया सीड स्पाइसेज में शामिल हैं. इनकी खेती कई राज्यों में की जाती है. सही मौसम और मिट्टी के अनुसार किसान इन फसलों को अपना सकते हैं. खासकर जीरे की खेती में मौसम और रोगों का ध्यान रखना जरूरी होता है.धनिया की फसल में बीज की क्वालिटी, खेत की तैयारी, सिंचाई और समय पर खरपतवार नियंत्रण पर ध्यान देना चाहिए. किसान अपने क्षेत्र के कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से स्थानीय वैरायटी और बुवाई का सही समय पता कर सकते हैं.
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मसालों से ज्यादा कमाई के लिए क्या करें?
मसालों की खेती में मुनाफा सिर्फ उत्पादन पर निर्भर नहीं करता. किसान को खेती शुरू करने से पहले अपने आसपास की मंडी में फसल का भाव, खरीदारों की मांग और खेती की लागत का हिसाब देखना चाहिए.अच्छी क्वालिटी वाले मसालों की मांग देश के साथ विदेशों में भी रहती है. स्पाइसेज बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में भारतीय मसाला एक्सपोर्ट में चिल्ली का योगदान वैल्यू के हिसाब से 27 प्रतिशत, क्यूमिन का 12 प्रतिशत और टर्मरिक का 7 प्रतिशत रहा. यानी इन मसालों का व्यापार और बाजार काफी बड़ा है.किसान चाहें तो एक ही फसल पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपने खेत और मौसम के अनुसार अलग-अलग मसालों को शामिल कर सकते हैं. इससे बाजार भाव में उतार-चढ़ाव का असर कम करने में मदद मिल सकती है.
Disclaimer: किसी भी मसाले की खेती को सीधे सबसे ज्यादा मुनाफे वाली खेती मानना सही नहीं है. जमीन, पानी, मौसम, उत्पादन लागत और बाजार भाव हर किसान के लिए अलग होते हैं. इसलिए खेती शुरू करने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह और बाजार की जानकारी लेना जरूरी है.
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