आज के दौर में खेती के साथ किसान कई और चीजें साथ में चलाते हैं. जिससे आमदनी का सिर्फ एक ही सोर्स न रहे. बहुत से किसान खेती के साथ बकरी पालन के बिजनेस को भी चलाते हैं. लेकिन इस बिजनेस में कई बातें ध्यान रखनी होती है. जिनसे मुनाफा तय होता है. आपके मेमने यानी बकरी के बच्चे कितने स्वस्थ और सुरक्षित हैं यह भी मुनाफा प्रभावित करने वाला फैक्टर है. अक्सर देखने में आता है कि जन्म के शुरुआती कुछ हफ्तों में थोड़ी सी भी लापरवाही की वजह से मेमने बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं और फार्म में मृत्यु दर तेजी से बढ़ जाती है. नवजात बच्चे का इम्यून सिस्टम बहुत कमजोर होता है, जिसकी वजह से मौसम का हल्का सा बदलाव, गीलापन या बैक्टीरिया का हमला उनकी जान पर भारी पड़ जाता है.
बकरी पालक को बच्चे के जन्म लेते ही पहले घंटे से लेकर अगले कुछ महीनों तक खास प्रोटोकॉल फॉलो करना चाहिए. अगर आप शुरुआत से ही साफ-सफाई, सही न्यूट्रिशन, टाइमली वैक्सीनेशन और शेड मैनेजमेंट पर ध्यान देंगे. तो बच्चे हर तरह के इन्फेक्शन से बचे रहेंगे. चलिए आपको बताते हैं कि नवजात बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए किन जरूरी बातों का ख्याल रखना है जरूरी.
जन्म के तुरंत बाद की जरूरी देखभाल
मेमने के जन्म लेते ही कुछ बातों को तुरंत करना चाहिए. जिनमे सबसे पहले उसकी सांस नली साफ करनी चाहिए. बच्चे के मुंह और नाक में फंसी लार या झिल्ली को साफ-सुथरे कपड़े से तुरंत पोंछें. जिससे वह बिना किसी दिक्कत के आसानी से सांस पाए. अगर बच्चा सांस लेने में दिक्कत महसूस करे तो उसके पिछले पैरों को पकड़कर हल्का सा ऊपर उठाएं और सीने को हल्के हाथ से सहलाएं. इसके बाद बच्चे के शरीर को साफ सूखे तौलिए से पोंछकर सुखाएं या फिर मां को उसे चाटने दें. जिससे बच्चे का ब्लड सर्कुलेशन एक्टिव हो जाता है.
दूसरा सबसे जरूरी काम है अम्बिलिकल कॉर्ड की सही कटाई है. पेट से लगभग 2 से 3 इंच की दूरी छोड़कर नाल को नए और स्टरलाइज्ड ब्लेड से काटें. इसके तुरंत बाद कटे हुए हिस्से पर टिंचर आयोडीन या बीटाडीन का घोल अच्छी तरह लगाएं. यह कदम बेहद जरूरी है क्योंकि खुली नाल से बैक्टीरिया सीधे शरीर में घुसकर जानलेवा इन्फेक्शन पैदा कर सकते हैं.

सही खान-पान होना जरूरी
जन्म के कुछ घंटे में मेमने को मां का पहला गाढ़ा पीला दूध पिलाना बहुत जरूरी है. क्योंकि इस गाढ़े दूध में बच्चे के लिए जरूरी एंटीबॉडीज, विटामिन्स और मिनरल्स होते हैं. जो उसके इम्यून सिस्टम कोतुरंत मजबूत बनाने में मदद करते हैं और उसे दस्त, निमोनिया और दूसरी मौसमी बीमारियों से बचाते हैं. दूध पिलाने से पहले बकरी के थनों को गुनगुने पानी से धोएं और साफ कपड़े से जरूर पोंछ लें.
जिससे कोई बाहरी गंदगी बच्चे के पेट में न जाए. शुरुआत के 15 दिनों तक बच्चे को दिन में 4 से 5 बार मां का दूध जरूर मिलना चाहिए. जब बच्चा करीब 3 से 4 हफ्ते का हो जाए, तब उसे बहुत मुलायम हरी पत्तियां, सुपाच्य हरा चारा और थोड़ा-थोड़ा स्टार्टर दाना चुगने की आदत डालें. इससे बच्चे का रूमेन यानी पाचन तंत्र जल्दी से ग्रो होता है और वजन तेजी से बढ़ता है.
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इन बातों का ध्यान जरूर रखें
मेमनों को बीमारियों से दूर रखने के लिए शेड का सूखा और हवादार होना बहुत जरूरी है. जमीन पर गीलापन बिल्कुल न रहने दें क्योंकि नमी की वजह से कॉक्सिडियोसिस और निमोनिया जैसी जानलेवा बीमारियां सबसे ज्यादा फैलती हैं. फर्श पर सूखी पुआल या चूने की हल्की परत बिछाकर रखें जिससे गर्माहट बनी रहे और कीटाणु न पनपें. सर्दियों में ठंडी हवाओं से बचाने के लिए शेड में पर्दे लगाएं और रात के वक्त गर्माहट के लिए बल्ब का इंतजाम करें.

इसके साथ ही जब मेमना 2 से 3 महीने का हो जाए, तो पशु चिकित्सक की सलाह से नियमित रूप से पेट के कीड़ों की दवा जरूर दें. अगर आप सही समय पर पीपीआर, एंट्रोटॉक्सिमिया जैसी खतरनाक बीमारियों का टीका लगवा लेंगे तो आगे चलकर परेशानी नहीं आएगी.
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