आज के समय में कृषि के क्षेत्र में अब ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, जिनसे किसान सीमित जमीन और पानी का बेहतर उपयोग कर सकें. इस तकनीक को एकीकृत कृषि प्रणाली यानि कि Integrated Farming System कहते हैं. इसके तहत एक ही खेत में अलग-अलग कृषि गतिविधियों को इस तरह जोड़ा जाता है कि एक गतिविधि का दूसरी गतिविधि के काम आ सके. इस मॉडल के जरिए आप खेत के एक हिस्से में आलू की खेती और दूसरे हिस्से में मछली पालन कर सकते हैं.
ऐसे होती है आलू और मछली की एक साथ खेती
इस तकनीक में खेत को सामान्य तरीके से पूरी तरह समतल नहीं किया जाता. इसमें खेत के आसपास या बीच में एक तालाब बनाया जाता है. तालाब में मछलियां पाली जाती हैं, जबकि उसके चारों ओर आलू सहित अन्य फसलों की खेती की जाती है. तालाब का पानी जरूरत के अनुसार खेत में सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है. वहीं खेत से बहकर आने वाले पोषक तत्व तालाब पानी को भी प्रभावित करते हैं. इसमें आलू की फसल मिट्टी में और मछली तालाब के पानी में अलग-अलग हिस्सों में पाली जाती है. दोनों गतिविधियों को एक ही जगह जोड़कर उत्पादन बढ़ाया जाता है.
मछली पालन के फायदे
मछली पालन वाले तालाब का पानी पोषक तत्वों से भरपूर होता है. उचित प्रबंधन के साथ इस पानी का इस्तेमाल खेत की सिंचाई में किया जाता है. इससे किसानों को कुछ परिस्थितियों में खाद और पानी के खर्च को कम करने में मदद मिलती है. इसके अलावा तालाब खेत में पानी को रोकने का काम भी करता है. बारिश के मौसम में अतिरिक्त पानी को इकठ्ठा कर बाद में सिंचाई के लिए उपयोग किया जा सकता है.
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किसान की आय कैसे बढ़ती है?
पारंपरिक खेती में किसान को एक ही फसल पर निर्भर रहना पड़ता है. वहीं जब फसल का उत्पादन या बाजार भाव प्रभावित होता है तो पूरी आय पर असर पड़ता है, लेकिन एकीकृत कृषि मॉडल में किसान को एक ही जमीन से फसल और मछली पालन करने से दोनों से आय होने का फायदा रहता है. इसके अलावा किसान चाहें तो तालाब के किनारे अन्य सब्जियों या फसलों की खेती भी कर सकता है.
किन बातों का रखना चाहिए ध्यान?
आलू और मछली पालन को एक साथ शुरू करने से पहले खेत की मिट्टी, पानी का भराव, जल निकासी और स्थानीय जलवायु की जानकारी जरूर लें. वहीं तालाब की गहराई और आकार भी वैज्ञानिक तरीके से तय करना जरूरी होता है. साथ ही मछली की ऐसी प्रजातियों का चुनाव करना चाहिए जो स्थानीय मौसम और पानी की परिस्थितियों के अनुकूल हों.
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