Livestock Insurance Scheme: गांव से लेकर शहर तक, आज के समय में पशुपालन कमाई का एक अहम जरिया है. गाय, भैंस, बकरी, भेड़ या ऊंट जैसे पशु परिवार के लिए दूध और दूसरे तरीकों से आमदनी देते हैं. लेकिन अगर बीमारी, दुर्घटना या किसी दूसरे कारण से पशु की मौत हो जाए, तो पशुपालक को एक साथ बड़ा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है. खासकर दुधारू पशु की मौत से खरीद पर लगाया पैसा तो डूबता ही है, लेकिन इसके साथ-साथ रोज की कमाई भी बंद हो जाती है. ऐसे में पशुधन बीमा पशुपालकों के लिए आर्थिक सहारा बन सकता है.
पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के मुताबिक, पशुधन बीमा का मुख्य मकसद पशु की मौत से होने वाले आर्थिक नुकसान को कम करना है. अगर बीमित पशु की मौत योजना में तय शर्तों के मुताबिक होती है, तो पशुपालक को बीमा राशि मिल सकती है. इससे किसान को नया पशु खरीदने या पुराने नुकसान की भरपाई करने में कुछ मदद मिल जाती है. यही वजह है कि सरकार पशुधन बीमा को पशुपालकों की आमदनी और आजीविका की सुरक्षा से जोड़कर बढ़ावा दे रही है.
सरकार उठाती है प्रीमियम का बड़ा हिस्सा
पशुधन बीमा की सबसे खास बात यह है कि कई सरकारी योजनाओं में पूरा प्रीमियम पशुपालक को खुद नहीं देना पड़ता. सरकार प्रीमियम पर सब्सिडी देती है, जिससे कम खर्च में पशु का बीमा कराया जा सकता है. राष्ट्रीय पशुधन बीमा योजना के तहत सामान्य राज्यों में पशुपालक को करीब 15 फीसदी प्रीमियम देना होता है, जबकि बाकी 85 फीसदी राशि केंद्र और राज्य सरकार की ओर से सब्सिडी के तौर पर दी जाती है. यानी पशुपालक पर बीमा का खर्च काफी कम हो जाता है.
कुछ राज्यों में इससे भी अलग व्यवस्था है. उदाहरण के तौर पर राजस्थान की मुख्यमंत्री मंगला पशु बीमा योजना में पात्र पशुपालकों को मुफ्त बीमा कवरेज देने का प्रावधान बताया गया है. इसमें गाय-भैंस के अलावा भेड़, बकरी और ऊंट जैसे पशुओं को भी शामिल किया जाता है.
यह भी पढ़ें: एक दिन में कितना दूध देती है मगातिह ऊंटनी? भारत में कहां मिलेगी
गाय-भैंस से बकरी तक कितना मिल सकता है पैसा?
बीमा में मिलने वाली रकम हर पशु के लिए एक जैसी नहीं होती. यह पशु की प्रजाति, नस्ल, कीमत और संबंधित योजना के नियमों पर निर्भर करती है. अलग-अलग योजनाओं के तहत गाय और भैंस के लिए करीब 40,000 से 60,000 रुपये तक का बीमा कवर मिल सकता है. बैल और ऊंट के लिए भी योजना के हिसाब से इसी तरह का कवर हो सकता है. वहीं भेड़ और बकरी के लिए करीब 4,000 से 15,000 रुपये प्रति पशु तक बीमा राशि का प्रावधान अलग-अलग योजनाओं में मिलता है. कुछ योजनाओं में पशु के स्थायी रूप से विकलांग होने पर भी बीमा राशि के एक हिस्से का भुगतान किया जा सकता है. कुछ मामलों में यह राशि 75 फीसदी तक हो सकती है.
बीमा कराने से पहले टैग और दस्तावेज जरूर देखें
पशु का बीमा कराने से पहले उसकी पहचान और स्वास्थ्य से जुड़े दस्तावेज पूरे रखना जरूरी है. पशु के कान में लगाया गया टैग काफी अहम होता है. इसी के जरिए बीमित पशु की पहचान की जाती है और क्लेम के समय भी इसका इस्तेमाल हो सकता है. इसके अलावा स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र समेत दूसरे जरूरी कागज भी मांगे जा सकते हैं. इसलिए बीमा कराने से पहले पशुपालक को यह जरूर जांच लेना चाहिए कि पशु की टैगिंग और सभी जरूरी दस्तावेज पूरे हैं.
यह भी पढ़ें: इंसानों ने कुत्तों को पालना कब शुरू किया, इससे पहले कौन था सबसे करीबी जानवर?
