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कैसे होती है कुसुम की खेती? जानें तरीका, सबसे ज्यादा इसी की बढ़ी MSP

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ABP News
October 2, 2026•3 min read
कैसे होती है कुसुम की खेती? जानें तरीका, सबसे ज्यादा इसी की बढ़ी MSP

Kusum Ki Kheti: रबी सीजन में किसान ऐसी फसल की तलाश में रहते हैं, जिसमें कम पानी में भी अच्छी पैदावार मिल सके. कुसुम ऐसी ही तिलहन फसलों में शामिल है. इसकी खेती कम पानी वाले इलाकों में की जाती है. कुसुम के बीजों में करीब 24 से 36 फीसदी तक तेल पाया जाता है, जिसका इस्तेमाल खाने के तेल से लेकर साबुन, पेंट और वार्निश जैसी चीजों में होता है. इस बार कुसुम की MSP में भी छह रबी फसलों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी की गई है.

केंद्र सरकार ने कुसुम की MSP 6,540 रुपये से बढ़ाकर 7,215 रुपये प्रति क्विंटल कर दी है. यानी किसानों को पहले के मुकाबले 675 रुपये प्रति क्विंटल ज्यादा MSP मिलेगी. सरकार का जोर कम पानी वाले इलाकों में तिलहन का उत्पादन बढ़ाने पर भी है. कुसुम की खेती महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में ज्यादा होती है.

सितंबर के आखिर से अक्टूबर तक करें बुवाई

कुसुम की बुवाई का सही समय सितंबर के आखिरी दिनों से अक्टूबर के पहले सप्ताह तक माना जाता है. किसान इसकी बुवाई कतारों में करें तो फसल की देखभाल करना आसान रहता है. इसके लिए कतार से कतार की दूरी लगभग 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 25 सेंटीमीटर रखें. बीज को 3 से 4 सेंटीमीटर गहराई में बोना सही रहता है. एक हेक्टेयर खेत के लिए लगभग 15 से 20 किलो बीज पर्याप्त होते हैं.

बुवाई से पहले बीज उपचार जरूरी

अच्छी फसल के लिए बीज को सीधे खेत में डालने के बजाय बुवाई से पहले उसका उपचार करना फायदेमंद रहता है. इसके लिए प्रति किलो बीज में कैप्टान, थीरम या मैंकोजेब की 3 ग्राम मात्रा से उपचार किया जा सकता है. खेत की तैयारी के समय 15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर मिट्टी में अच्छी तरह मिला सकते हैं. केमिकल खाद के रूप में 60 किलो नाइट्रोजन, 40 किलो फास्फोरस और 20 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर का इस्तेमाल किया जा सकता है.

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कम पानी में भी हो जाती है कुसुम की खेती

कुसुम को आमतौर पर कम पानी वाली और वर्षा आधारित खेती के लिए बेस्ट माना जाता है. अगर खेत में सिंचाई की सुविधा है, तो बुवाई के लगभग 30 दिन बाद एक सिंचाई की जा सकती है. खेत में खरपतवार ज्यादा होने पर समय-समय पर निराई-गुड़ाई करनी चाहिए.

130 से 140 दिन में तैयार हो जाती है फसल

कुसुम की फसल आमतौर पर बुवाई के करीब 130 से 140 दिन बाद पककर तैयार हो जाती है. असिंचित खेतों में लगभग 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिल सकता है, जबकि सिंचाई की सुविधा वाले खेतों में यह उपज 14 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है. इस तरह कम पानी वाले इलाकों के किसानों के लिए कुसुम खेती और बढ़ी हुई MSP को देखते हुए रबी सीजन में एक विकल्प हो सकती है.

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