कुदरत का मिजाज कब बदल जाए कोई नहीं जानता. कभी बेमौसम बारिश, कभी सूखा, तो कभी ओलावृष्टि किसानों की महीनों की कड़ी मेहनत पर पल भर में पानी फेर देती है. ऐसे बुरे वक्त में किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ जाता है. लेकिन उन्हें इस नुकसान से बचाने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना बहुत काम आती है. लेकिन योजना में कुछ तय नियम है जिनका पालन करना जरूरी है. अक्सर यह देखा जाता है कि प्रीमियम भरने के बावजूद हजारों किसानों का बीमा क्लेम रिजेक्ट हो जाता है या महीनों तक सरकारी दफ्तरों में अटका रह जाता है.
बहुत से किसानों को इस बात का पता नहीं चल पाता आखिर ऐसा क्यों होता है. तो आपको बता दें इस तरह के ज्यादातर मामलों में किसानों की ओर से फॉर्म भरते समय या नुकसान की सूचना देते वक्त की गई छोटी गलतियों वजह बनती है. नियमों की सही जानकारी न होना और तय समय सीमा का ध्यान न रखना सबसे बड़ी दिक्कत बन जाता है. अगर आप चाहते हैं कि फसल बर्बाद होने पर बीमा कंपनी आपको पूरा और सही मुआवजा दे तो इन आम गलतियों से बचना बेहद जरूरी है.
72 घंटे की डेडलाइन पर ध्यान दें
फसल बीमा क्लेम खारिज होने की सबसे बड़ी और आम वजह है नुकसान की सूचना देने में देरी करना है. सरकारी नियमों के मुताबिक अगर ओलावृष्टि, जलभराव या लैंडस्लाइड जैसी आपदा से फसल खराब होती है. तो किसान को घटना के 72 घंटे के भीतर इसकी जानकारी बीमा कंपनी को देनी होती है. कई किसान हफ्तों बाद जानकारी देते हैं तब तक सर्वेयर नुकसान का सही आंकलन नहीं कर पाते और क्लेम तुरंत रिजेक्ट हो जाता है.
सूचना देने के लिए सरकार के क्रॉप इंश्योरेंस ऐप, टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर या अपने नजदीकी कृषि कार्यालय का इस्तेमाल करें. ऐप से अप्लाई करते समय सीधे खेत से जीपीएस लोकेशन वाली लाइव फोटो और छोटा वीडियो जरूर अपलोड करें. जितनी जल्दी और सही तरीके से जानकारी दर्ज होगी सर्वे की टीम उतनी ही तेजी से आपके खेत का मुआयना करने पहुंचेगी और क्लेम पास होने चांस बढ़ जाएंगे.

जानकारी देते वक्त गलती न करें
बीमा फॉर्म भरते समय दस्तावेजों की छोटी सी गड़बड़ी बाद में बहुत बड़ी परेशानी बन जाती है. अक्सर किसान बैंक खाता नंबर, आईएफएससी कोड या नाम की स्पेलिंग में गलती कर बैठते हैं. कई बार जब बैंक का किसी दूसरे बैंक में विलय हो जाता है. तो पुराना आईएफएससी कोड अमान्य हो जाता है और क्लेम का पैसा खाते में आते-आते अटक जाता है. इसके अलावा जमीन के दस्तावेज यानी खसरा-खतौनी नंबर और बोई गई वास्तविक फसल का सही मिलान होना बहुत जरूरी है.
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अगर आपने फॉर्म में धान भरा है और खेत में कोई दूसरी फसल बो रखी है. तो सर्वे के दौरान गड़बड़ी पकड़ में आते ही आपका दावा पूरी तरह निरस्त कर दिया जाएगा. फॉर्म सबमिट करने से पहले अपने आधार कार्ड के नाम और बैंक पासबुक की हर एक डिटेल को दो बार अच्छी तरह चेक कर लें जिससे पेमेंट के वक्त कोई तकनीकी रुकावट न आए.

इन दस्तावेजों को अप टू डेट रखें
कई बार किसान यह मान लेते हैं कि बैंक से केसीसी लोन कटने के साथ ही उनका बीमा खुद-ब-खुद पूरा हो गया. लेकिन वे प्रीमियम कटने की पक्की रसीद या पॉलिसी सर्टिफिकेट लेना भूल जाते हैं. हमेशा अपने बैंक या सीएससी सेंटर से बीमा पॉलिसी का दस्तावेज मांगें और उसे संभालकर रखें. अगर आपने इस सीजन में अपनी फसल बदल दी है. तो कट-ऑफ डेट से पहले बैंक को लिखित सूचना देकर फसल का नाम अपडेट जरूर करवाएं.
वरना पुरानी फसल के आधार पर क्लेम खारिज हो जाएगा. इसके अलावा जब पटवारी या कृषि विभाग की टीम गांव में क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट के जरिए पैदावार का सर्वे करने आए. तो उसमें सक्रिय भागीदारी निभाएं. ग्राम स्तर पर होने वाले इस औसत उपज आंकलन के आधार पर ही व्यापक नुकसान का क्लेम तय होता है.
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