भारत के ग्रामीण इलाकों में किसान अपनी फसलों को मजबूत और अधिक पैदावार वाली बनाने के लिए पारंपरिक और प्राकृतिक तरीकों की तरफ लौट रहे हैं. इन दिनों देश के कई राज्यों में किसान धान की कटाई के बाद अपने खाली खेतों में बकरियों के झुंड को चराने के लिए छोड़ रहे हैं. यह देखने में भले ही एक सामान्य चरवाहे की दिनचर्या लगे, लेकिन आधुनिक कृषि विज्ञान के अनुसार यह खेतों की मिट्टी को उपजाऊ बनाने और बिना किसी केमिकल के फसलों की पैदावार बढ़ाने का सबसे बेहतरीन और सस्ता फॉर्मूला साबित हो रहा है.
खेतों को मिलता है नाइट्रोजन और पोटेशियम
बकरियां जब खेत में चरती हैं, तो उनके द्वारा छोड़ी जाने वाली बीट और मूत्र मिट्टी के लिए अमृत का काम करते हैं. बकरी की बीट में गाय या भैंस के गोबर की तुलना में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम की मात्रा कहीं अधिक होती है. यह एक बेहतरीन ऑर्गेनिक खाद है जो धीरे-धीरे मिट्टी में घुलकर उसकी उर्वरा शक्ति को बढ़ाती है. इसके इस्तेमाल से जमीन में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, जिससे अगली फसल के पौधे बेहद मजबूत और अधिक दानों वाले बनते हैं.
खेतों की प्राकृतिक जुताई
खेत के भीतर जब दर्जनों बकरियां एक साथ घूमती हैं, तो उनके छोटे और नुकीले खुरों की हलचल से जमीन की ऊपरी परत प्राकृतिक रूप से टूटती है. करियों के पैरों की इस हलचल से मिट्टी के कड़क हिस्से टूट जाते हैं और उसमें हवा का प्रवाह बेहतर हो जाता है. इससे मिट्टी की पानी सोखने और उसे लंबे समय तक सोखकर रखने की क्षमता काफी बढ़ जाती है, जिससे सिंचाई में कम पानी खर्च होता है.
खरपतवार और हानिकारक कीटों का सफाया
धान या अन्य फसलों की कटाई के बाद खेतों में कई तरह की अनचाही घास और खरपतवार उग आते हैं, जो मिट्टी के जरूरी पोषक तत्वों को सोख लेते हैं. बकरियों को कटीली झाड़ियां, कड़े पौधे और खरपतवार खाना बेहद पसंद होता है. वे खेत की मेड़ों और बीच में मौजूद अनचाही घास को पूरी तरह साफ कर देती हैं. इसके साथ ही, वे मिट्टी में छिपे नुकसानदेह कीड़ों और उनके अंडों को भी खा जाती हैं, जिससे अगली फसल में बीमारियां लगने का खतरा न के बराबर रह जाता है.
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किसानों को डबल मुनाफा
इस प्राकृतिक तकनीक को अपनाने से किसानों का बाजार से महंगी रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाएं खरीदने का खर्च पूरी तरह बच जाता है. मिट्टी की सेहत सुधरने से गेहूं, दलहन या सब्जियों की अगली फसल की पैदावार में 20 से 30 फीसदी तक की बढ़ोतरी दर्ज की जाती है. इसके अलावा, किसानों को बकरियों के दूध और मांस से अलग से एक्स्ट्रा आमदनी हो जाती है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक मजबूत बैकअप मिलता है.
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