Fertilizer Subsidy: खेती में खाद का खर्च किसानों की लागत का बड़ा हिस्सा होता है. खासकर यूरिया की कीमत को लेकर किसानों के मन में अक्सर सवाल रहता है कि बाजार में इसकी असली कीमत कितनी है और सरकार इस पर कितनी सब्सिडी देती है. दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमत बढ़ने के बावजूद किसानों को यह खाद कम कीमतों पर उपलब्ध कराई जाती है. केंद्र सरकार यूरिया की लागत और किसान से ली जाने वाली कीमत के बीच का अंतर सब्सिडी के जरिए पूरा करती है.
केंद्र सरकार के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 45 किलो नीम कोटेड यूरिया की आधिकारिक अधिकतम खुदरा कीमत 242 रुपये प्रति बोरी है. इस कीमत में नीम कोटिंग का शुल्क और लागू टैक्स शामिल नहीं हैं. इसलिए किसान को दुकान पर भुगतान करते समय अंतिम कीमत थोड़ी अलग दिखाई दे सकती है.
सरकार कितनी सब्सिडी देती है?
फिलहाल 45 किलो यूरिया की एक बोरी की सरकारी तय कीमत 242 रुपये है. इसमें नीम कोटिंग की फीस और लागू टैक्स शामिल नहीं हैं. वित्त मंत्री ने बताया कि किसान यूरिया की बोरी के लिए करीब 300 रुपये चुकाते हैं. वहीं, यूरिया की असली लागत इससे काफी ज्यादा होती है, जिसका बड़ा हिस्सा सरकार सब्सिडी के रूप में देती है. यूरिया पर मिलने वाली सब्सिडी हर बोरी के लिए एक जैसी तय रकम नहीं होती. सरकार यूरिया को खरीदने और किसान तक पहुंचाने में जितना खर्च होता है और किसान से जितने पैसे लिए जाते हैं, उसके बीच का अंतर सब्सिडी के तौर पर देती है. यह पैसा सीधे किसान के बैंक खाते में नहीं आता. सरकार यह रकम खाद बनाने वाली कंपनियों और यूरिया आयात करने वाली कंपनियों को देती है.
यूरिया की असली कीमत
आंध्र प्रदेश के मदनपल्ले में एक कार्यक्रम के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि दुनिया के बाजार में यूरिया के दाम काफी बढ़ने के बावजूद केंद्र सरकार किसानों को सस्ती दर पर खाद दे रही है. सरकार एक बोरी यूरिया पर करीब 2,700 रुपये की सब्सिडी दे रही है. उन्होंने बताया कि, कोरोना महामारी और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कई बार यूरिया को दूसरे देशों से खरीदने का खर्च बढ़कर करीब 3,000 रुपये प्रति बोरी तक पहुंच गया था. इसके बावजूद सरकार ने इसका पूरा बोझ किसानों पर नहीं डाला. किसानों को करीब 300 रुपये में यूरिया की बोरी मिलती रही.
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यूरिया की कीमत क्यों नहीं बढ़ती?
भारत अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा यूरिया दूसरे देशों से खरीदता है. विदेशों में कच्चे माल और गैस के दाम बढ़ने पर यूरिया बनाने का खर्च भी बढ़ जाता है. इसके अलावा बंदरगाह से खाद को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने में भी खर्च होता है. इसके बावजूद सरकार यूरिया की कीमत को तय रखती है और बढ़े हुए खर्च को सब्सिडी के जरिए पूरा करती है.
किसान खाद खरीदते समय रखें ध्यान
किसानों को यूरिया हमेशा अधिकृत विक्रेता या निर्धारित बिक्री केंद्र से ही खरीदना चाहिए. खाद की बोरी पर छपी MRP जरूर देखें और तय कीमत से ज्यादा पैसा मांगे जाने पर शिकायत करें. सरकार ने खाद की कालाबाजारी, जमाखोरी और ज्यादा कीमत वसूलने के खिलाफ कार्रवाई भी तेज की है.
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