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नहीं मिले फसल के सही दाम, यह सरकारी योजना आएगी किसानों के काम

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ABP News
September 10, 20264 min read
नहीं मिले फसल के सही दाम, यह सरकारी योजना आएगी किसानों के काम

खेती में जी-तोड़ पसीना बहाने के बाद भी जब मंडी में फसल के कौड़ी के भाव मिलते हैं. तो किसान की कमर टूट जाती है. मौसम की मार, खाद-बीज का भारी खर्च और फिर कटाई के बाद औने-पौने दामों में माल बेचने की मजबूरी किसानों की सबसे बड़ा परेशानी रही है. अक्सर अच्छी पैदावार होने पर भी मार्केट क्रैश हो जाता है और लागत निकलना तक मुश्किल हो जाता है. किसानों की इस समस्या को खत्म करने और उन्हें घाटे से सुरक्षित रखने के लिए एमपी सरकार लेकर आई है भावांतर भुगतान योजना.

यह योजना एक फाइनेंशियल शील्ड यानी आर्थिक ढाल की तरह काम करती है. अगर खुले बाजार या मंडी में किसान को उसकी फसल का सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP नहीं मिल पाता. तो सरकार बीच के इस घाटे की पूरी भरपाई सीधे किसान के बैंक खाते में करती है. अब फसल कम रेट पर बिकने का डर किसानों का आर्थिक नुकसान नहीं करवाएगा. क्योंकि भावांतर योजना करेगी मदद.

कैसे काम करती है भावांतर योजना?

बहुत से किसानों को भावांतर योजना किस तरह काम करती है. इस बारे में जानकारी नहीं अगर आप भी उन्हीं में शामिल हैं. तो फिर आप एक आसान उदाहरण से समझ सकते हैं. मान लीजिए सरकार ने किसी फसल का एमएसपी 4000 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है. लेकिन पीक आवक के समय मंडी में वही फसल 3200 रुपये प्रति क्विंटल पर बिकी. ऐसे में किसान को प्रति क्विंटल 800 रुपये का सीधा नुकसान हो रहा होता है.

भावांतर योजना इसी 800 रुपये के अंतर यानी भाव के अंतर को सीधे किसान के बैंक खाते में ट्रांसफर कर देती है. इससे किसान को कभी भी मजबूरी में अपना माल दबाकर या औने-पौने रेट पर बेचने का मलाल नहीं रहता. इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि सरकार को खुद भारी मात्रा में अनाज खरीदकर गोदामों में सड़ाने की जरूरत नहीं पड़ती और किसान को भी अपनी पूरी मेहनत का सही दाम अपने घर बैठे मिल जाता है.

किन फसलों पर मिलता है फायदा?

शुरुआत में इस योजना का फोकस मुख्य रूप से सोयाबीन, मूंगफली, मक्का, मूंग, उड़द और तिलहन जैसी उन नकदी फसलों पर रखा गया है. जिनके बाजार भाव में सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है. बाद में कई बागवानी और मौसमी सब्जियों को भी इसके दायरे में जोड़ा गया है. योजना का लाभ लेने के लिए राज्य सरकारें बकायदा एक निश्चित सेलिंग विंडो यानी बिक्री की तारीखें तय करती हैं.

किसानों को सिर्फ इसी तय समय सीमा के भीतर रजिस्टर्ड कृषि उपज मंडी समिति में जाकर अपनी फसल बेचनी होती है. मंडी का अधिकृत व्यापारी जब किसान को भुगतान करता है. तो उसका पूरा डिजिटल बिल पोर्टल पर ऑटो-अपलोड हो जाता है. इसके बाद सरकार मॉडल रेट तय करती है और अंतर की राशि सीधे डीबीटी के जरिए कुछ ही हफ्तों के भीतर किसान के खाते में भेज देती है.

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क्या है योजना में रजिस्ट्रेशन का तरीका?

इस योजना का फायदा उठाने के लिए फसल बुवाई के तुरंत बाद ही ई-उपार्जन पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होता है. किसान नजदीकी कॉमन सर्विस सेंटर, लोक सेवा केंद्र या खुद से भी ऑनलाइन अप्लाई कर सकते हैं. आवेदन के समय किसान के पास आधार कार्ड, बैंक पासबुक की कॉपी, जमीन के खसरा-खतौनी के कागजात और चालू मोबाइल नंबर होना जरूरी है.


फॉर्म भरते समय यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है कि बैंक खाता आधार से एनपीसीआई लिंक हो जिससे डीबीटी पेमेंट अटकने की कोई गुंजाइश न रहे. रजिस्ट्रेशन के बाद लोकल पटवारी या कृषि विभाग की टीम खेत के रकबे का फिजिकल वेरिफिकेशन करती है. वेरिफिकेशन पास होते ही किसान को एक रसीद मिल जाती है. जिसके बाद मंडी में फसल बेचते ही उसका क्लेम ऑटोमैटिक प्रोसेस हो जाता है.

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