Agriculture

क्या है रतुआ रोग, कैसे करें इससे बचाव? रबी की बुवाई से पहले जान लें

N
ABP News
October 1, 2026•4 min read
क्या है रतुआ रोग, कैसे करें इससे बचाव? रबी की बुवाई से पहले जान लें

रबी सीजन में गेहूं की फसल में कई तरह के रोग लगने का खतरा रहता है, जिनमें रतुआ रोग किसानों के लिए बड़ी परेशानी बन सकता है. मौसम में बदलाव, ज्यादा नमी और अनुकूल तापमान मिलने पर यह बीमारी तेजी से फैल सकती है. रतुआ रोग का असर गेहूं की पत्तियों से शुरू होता है और धीरे-धीरे पौधे की बढ़वार पर भी असर पड़ सकता है. इससे पत्तियां कमजोर होने लगती हैं और पौधे की दाने बनाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, जिससे उत्पादन घटने का खतरा रहता है.

गेहूं में मुख्य रूप से तीन तरह का रतुआ रोग पाया जाता है - पीला रतुआ, भूरा रतुआ और काला रतुआ. इन तीनों की पहचान उनके अलग-अलग रंग और लक्षणों से की जा सकती है. ऐसे में किसानों के लिए जरूरी है कि वे खेत में फसल की नियमित निगरानी करें और पत्तियों पर किसी भी तरह के निशान दिखाई देने पर तुरंत ध्यान दें. समय रहते रतुआ रोग की पहचान और सही रोकथाम से फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है.

पीला रतुआ कैसे पहचानें?

पीला रतुआ गेहूं (Ratua Rog Ki Pehchan) की पत्तियों पर पीली धारियों के रूप में दिखाई देता है. खेत में पौधों को देखने पर पत्तियों पर छोटे-छोटे पीले निशान एक लाइन में नजर आ सकते हैं. रोग बढ़ने पर पत्तियों का बड़ा हिस्सा पीला पड़ने लगता है. इस वजस से कई बार पत्तियों से पीले रंग का महीन पाउडर जैसा पदार्थ भी निकलता है, जो फसल के आसपास गिरा हुआ दिखाई दे सकता है. अगर पौधों में कल्ले निकलने के समय यह बीमारी ज्यादा फैल जाए तो बालियां बनने में भी दिक्कत आ सकती है.

  • इस रोग की शुरुआत दिखाई देने पर किसान प्रति लीटर पानी में 2 ग्राम मैंकोजेब 75 डब्ल्यूपी मिलाकर छिड़काव कर सकते हैं.
  • दवा का इस्तेमाल हमेशा उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करें.

भूरा रतुआ फसल को पहुंचा सकता है नुकसान

भूरे रतुआ को पत्ती का रतुआ भी कहा जाता है. इसकी शुरुआत गेहूं की पत्तियों के ऊपर छोटे नारंगी रंग के निशानों से होती है. कुछ समय बाद यही निशान गहरे भूरे रंग के हो जाते हैं. अगर बीमारी खेत में ज्यादा फैल जाए तो पौधे की पत्तियां अपना हरा रंग खोने लगती हैं, जिससे पौधे की बढ़वार भी प्रभावित हो सकती है. इसका सीधा असर गेहूं की फसल के उत्पादन पर पड़ सकता है. कुछ परिस्थितियों में तो पैदावार में करीब 30 फीसदी तक कमी की जानकारी दी जाती है.

  • भूरे रतुआ के नियंत्रण के लिए प्रति एकड़ 1.2 किलोग्राम डाईथेन एम-45 के छिड़काव की सलाह दी जाती है.
  • दवा की मात्रा और इस्तेमाल का तरीका स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करें.

यह भी पढ़ें: रबी की फसल में नहीं लगेंगे कीड़े, बुवाई से पहले इन बातों का रखें ख्याल

काला रतुआ के लक्षण

काले रतुआ को तने का रतुआ भी कहा जाता है. इस बीमारी की शुरुआत में गेहूं के तने और पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के निशान दिखाई दे सकते हैं. बीमारी बढ़ने पर इनका रंग और गहरा होकर काला नजर आने लगता है. तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने पर इसके तेजी से फैलने की संभावना बढ़ सकती है. इसलिए इससे बचाव के लिए मौसम गर्म होने के साथ किसानों को खेत की निगरानी बढ़ा देनी चाहिए.

  • इस रोग के नियंत्रण के लिए 0.1 फीसदी टेबुकोनाजोल 250 ईसी के छिड़काव की सलाह दी जाती है.
  • दवा का इस्तेमाल करने से पहले फसल की अवस्था और बीमारी की सही पहचान जरूर करें.

कैसे रखें गेहूं की फसल पर नजर?

रतुआ रोग से बचाव में सबसे जरूरी है कि, किसान खेत में नियमित रूप से पौधों की पत्तियां और तने पर नजर रहें. शुरुआत में अगर बीमारी के लक्षण दिखाई दे तो तुरंत कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है. एक बार रोग पूरे खेत में फैल जाने के बाद फसल को संभालना मुश्किल काफी हो जाता है. इसलिए पीली धारियां, नारंगी या भूरे धब्बे और तने पर काले निशान जैसे बदलाव दिखाई दें तो उन्हें नजरअंदाज न करें. सही समय पर पहचान और सही उपचार से गेहूं की फसल को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है.

यह भी पढ़ें: गोभी की फसल के लिए कितनी कारगर है स्पिनोसैड दवा? कैसे करें इस्तेमाल

Topics & Tags:#Agriculture
क्या है रतुआ रोग, कैसे करें इससे बचाव? रबी की बुवाई से पहले जान लें | Kisan Reporter