Rabies In Cattle: गांव या ग्रामीण इलाकों में पशुपालक अक्सर अपने गाय-भैंस को चरने के लिए खुले मैदानों में छोड़ देते हैं. लेकिन कई बार वहां आवारा कुत्ते या दूसरे जानवर पशुओं पर हमला कर देते हैं. इसी में अगर कोई संक्रमित कुत्ता गाय या भैंस को काट ले, तो किसानों को लेने के देने पड़ सकते हैं. इसकी वजह है रेबीज जो कि, कुत्तों से फैलने वाली एक ऐसी बीमारी जिससे पशुओं की जान तक जा सकती है.
रेबीज एक वायरस से होने वाली बीमारी है. यह संक्रमित जानवर की लार के जरिए फैल सकता है. जब संक्रमित कुत्ता, बंदर, नेवला या कोई दूसरा जानवर गाय-भैंस को काटता है, तो वायरस घाव के रास्ते शरीर में पहुंच सकता है. इसके बाद यह नसों के जरिए दिमाग तक पहुंचता है और बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं.
पशु में दिखें ये लक्षण तो रहें सतर्क
रेबीज होने पर पशु के व्यवहार में अचानक बदलाव दिख सकता है. वह बेचैन हो सकता है, असामान्य आवाजें निकाल सकता है या बिना वजह आक्रामक हो सकता है. कुछ पशुओं में इसके उलट सुस्ती और कमजोरी भी दिख सकती है. बीमारी बढ़ने पर पशु को निगलने में परेशानी हो सकती है, मुंह से लार ज्यादा निकल सकती है और चलने में लड़खड़ाहट आ सकती है. मांसपेशियों में झटके, शरीर का संतुलन बिगड़ना और लकवे जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं. ऐसे लक्षण दिखने पर पशु को छूने या खुद इलाज करने के बजाय तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें.
कुत्ता काट ले तो तुरंत क्या करें?
अगर किसी कुत्ते या दूसरे जानवर ने गाय-भैंस को काट लिया है, तो घाव को नजरअंदाज न करें.
- पशु को दूसरे जानवरों और लोगों से अलग, सुरक्षित जगह पर रखें और तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएं.
- डॉक्टर की सलाह के बिना घाव पर मिर्च, तेल, मिट्टी, राख या कोई घरेलू नुस्खा न लगाएं.
- पशु को रेबीज से बचाने के लिए आगे क्या कदम उठाने हैं, यह पशु चिकित्सक तय करेगा.

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पशुपालक खुद को कैसे बचाएं?
रेबीज का शक होने पर पशु की लार और घाव को नंगे हाथों से न छुएं. पशु को संभालने की जरूरत पड़े, तो सुरक्षित दूरी रखें और प्रशिक्षित व्यक्ति या पशु चिकित्सक की मदद लें. अगर संक्रमित पशु काट ले या उसकी लार किसी खुले घाव, आंख, नाक या मुंह में पहुंच जाए, तो तुरंत साबुन और बहते पानी से उस जगह को कम से कम 15 मिनट तक धोएं और बिना देर किए डॉक्टर के पास जाएं. रेबीज से बचाव के लिए आगे के इलाज की जरूरत डॉक्टर तय करेंगे.
पशुओं की सुरक्षा के लिए टीकाकरण और नियमित निगरानी भी जरूरी है. पशुपालक अपने पशु चिकित्सक से क्षेत्र में रेबीज से बचाव और टीकाकरण के बारे में सलाह लें. समय पर कदम उठाने से पशु और इंसान, दोनों को इस गंभीर बीमारी के खतरे से बचाने में मदद मिल सकती है.
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