Wheat Sowing: इस बार रबी सीजन में गेंहू की खेती करने वाले किसानों की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही है. कमजोर मॉनसून की वजह से खेतों में नमी घट गई है जिसका असर अब गेंहू की बुवाई पर साफ दिखने लगा है. हालात ऐसे हैं कि पिछले साल के मुकाबले इस बार गेंहू की शुरुआती बुवाई में लगभग 59 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.
दूसरी तरफ सरकार ने इस सीजन में 12.10 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का लक्ष्य रखा है. ऐसे में अब सवाल उठता है कि, जब खेतों में पर्याप्त नमी ही नहीं है, तो किसान बुवाई कैसे करेंगे और क्या इस बार रिकॉर्ड पैदावार का लक्ष्य पूरा हो भी पाएगा या नहीं? आइए जानते हैं किन राज्यों में कम बारिश से परेशानी बढ़ी है और दूसरी रबी फसलों का क्या हाल है.
गेहूं की बुवाई में कितनी आई गिरावट?
कृषि मंत्रालय के 23 अक्टूबर तक के आंकड़ों के मुताबिक, देश में इस बार सिर्फ 11 हजार हेक्टेयर में गेहूं की बुवाई हुई है. पिछले साल इसी समय तक 27 हजार हेक्टेयर में गेहूं बोया जा चुका था. यानी पिछले साल के मुकाबले शुरुआती बुवाई का रकबा लगभग 59 फीसदी कम है. हालांकि, कृषि मंत्रालय का कहना है कि, अभी कुछ ही राज्यों में बुवाई शुरू हुई है. इसलिए आने वाले हफ्तों में यह आंकड़ा बढ़ सकता है.
किन राज्यों में पानी की ज्यादा परेशानी?
कम बारिश का असर उन इलाकों में ज्यादा दिखाई दे सकता है, जहां किसान खेती के लिए बारिश पर निर्भर रहते हैं. इनमें राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड के कुछ हिस्से शामिल हैं. आंकड़ों के मुताबिक, इस मॉनसून में सामान्य से 13 प्रतिशत कम बारिश हुई है. पंजाब में 38 प्रतिशत और राजस्थान में 22 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई. इससे खेतों में नमी और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है.
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गेहूं उत्पादन का कितना है लक्ष्य?
- सरकार ने इस रबी सीजन में 12.10 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का लक्ष्य रखा है.
- पिछले सीजन में करीब 12.07 करोड़ टन उत्पादन हुआ था.
लेकिन इस बार पानी की कमी के साथ गर्म मौसम की आशंका भी बनी हुई है. ऐसे में अगर सर्दियों में तापमान सामान्य से ज्यादा रहता है, तो गेहूं की बढ़वार और दाना बनने पर असर पड़ सकता है.
दलहन और तिलहन की बुवाई भी पिछड़ी
गेहूं के अलावा दूसरी रबी फसलों की बुवाई भी धीमी है. 23 अक्टूबर तक दलहन की बुवाई 3.27 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले साल यह 4.39 लाख हेक्टेयर थी. तिलहन का रकबा भी 21.34 लाख से घटकर 13.38 लाख हेक्टेयर रह गया. हालांकि, मोटे अनाजों की बुवाई 13 हजार से बढ़कर 23 हजार हेक्टेयर पहुंची है.
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