भारत में भैंस पालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है. देश में भैंसों की कई देसी नस्लें हैं, जिनमें भदावरी भैंस अपनी खास पहचान रखती है. मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के आगरा, इटावा और आसपास के क्षेत्रों और मध्य प्रदेश के कुछ इलाकों में पाई जाने वाली यह नस्ल कम मात्रा में, लेकिन अधिक फैट वाला दूध देने के लिए जानी जाती है. ऐसे में आइए जानते हैं भदावरी भैंस से जुड़ी कुछ अन्य जानकारी.
भदावरी भैंस की खासियत
भदावरी भैंस को बहुत अधिक दूध देने वाली नस्लों की श्रेणी में नहीं रखा जाता. आमतौर पर एक स्वस्थ भदावरी भैंस एक दिन में करीब 5 से 8 लीटर दूध दे सकती है. हालांकि दूध की मात्रा भैंस की उम्र, ब्यांत की अवस्था, चारे, स्वास्थ्य और पशुपालन की परिस्थितियों पर निर्भर करती है. भदावरी की सबसे बड़ी विशेषता केवल दूध की मात्रा नहीं, बल्कि दूध में वसा की अच्छी मात्रा है. इसी कारण कम लीटर दूध के बावजूद इसके दूध का उपयोग घी और दूसरे दुग्ध उत्पादों के लिए किया जाता है.
कहां पाई जाती है यह भैंस?
भदावरी को मुख्य रूप से चंबल और यमुना के आसपास के क्षेत्रों से जोड़ा जाता है. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में इसका पारंपरिक पालन लंबे समय से होता आया है. इस नस्ल की एक खासियत यह भी मानी जाती है कि यह गर्म और कठिन जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल रह सकती है. स्थानीय पशुपालकों के लिए यह विशेषता महत्वपूर्ण है, क्योंकि हर नस्ल हर क्षेत्र की जलवायु में समान रूप से अच्छा प्रदर्शन नहीं करती.
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क्यों कम होती जा रही है भदावरी भैंस की संख्या?
भदावरी भैंस की संख्या घटने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं. सबसे बड़ा कारण यह है कि अब पशुपालक दूसरी अधिक दूध देने वाली नस्लों को पालने लगे हैं. पशुपालक अक्सर ऐसी भैंस रखना चाहते हैं जिससे ज्यादा मात्रा में दूध मिले और नियमित आय बढ़ाई जा सके. कई जगह स्थानीय भैंसों में दूसरी नस्लों के साथ क्रॉसब्रीडिंग होने के कारण शुद्ध नस्ल के पशुओं की संख्या प्रभावित होती है. वहीं कृषि पद्धतियों में बदलाव और पशुओं के लिए पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण चारे की उपलब्धता जैसी समस्याएं छोटे पशुपालकों को प्रभावित करती हैं.
भदावरी का बचाव क्यों जरूरी है?
भदावरी जैसी स्थानीय नस्लों को बचाना इसलिए जरूरी है क्योंकि भदावरी भैंस के दूध में फैट की मात्रा 6% से लेकर 14% तक होती है, जो दुनिया की किसी भी अन्य भैंस की नस्ल में सबसे ज्यादा है. अधिक फैट के कारण इसके दूध से बहुत अच्छी मात्रा में शुद्ध घी बनता है. वहीं भदावरी भैंस को महंगे चारे या दाने की कम जरूरत होती है. यह भूसा और कम गुणवत्ता वाले चारे को भी आसानी से पचाकर बेहतर दूध दे सकती है.
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