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कान देखकर बकरा क्यों खरीदते हैं किसान, इससे क्या पता चलता है?

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ABP News
September 21, 20264 min read
कान देखकर बकरा क्यों खरीदते हैं किसान, इससे क्या पता चलता है?

जब भी कोई पशुपालक बाजार में बकरा खरीदने जाता है. तो वह कई सारी चीजें चेक करता है. जिससे सही बकरा खरीदा जा सके. कई पशुपालक बकरे चाल-ढाल या सींग देखकर बकरा खरीद लेते हैं. लेकिन बहुत से पहले बकरे के कानों को देखते हैं. नग्रामीण इलाकों और खासकर पशु बाजारों में यह एक ऐसापुराना तरीका है. जिसे पीढ़ियों से आजमाया जा रहा है. आम लोगों को भले ही यह एक सामान्य सी बात लगे. लेकिन एक जानकार किसान के लिए बकरे के कान उसकी पूरी सेहत, नस्ल और उम्र का कच्चा-चिट्ठा खोलकर रख देते हैं.

बकरे के कान सिर्फ उसकी खूबसूरती बढ़ाने का काम नहीं करते. बल्कि पशु की असली कीमत और उसकी नस्ल के बारे में भी बताते हैं. पुराने और मंझे हुए खरीदार बिना किसी डॉक्टर और डाॅक्यूमेंट के सिर्फ कान छूकर और देखकर ही बता देते हैं कि बकरा अंदर से कितना तंदुरुस्त है और वह आगे चलकर मुनाफा देगा या नहीं. यही वजह है कि बकरा खरीदने का यह अनोखा तरीका आज भी पशु बाजारों में सबसे ऊपर माना जाता है.

कान से पता चलती है सेहत और नस्ल

बकरे के कान देखकर सबसे पहले उसकी नस्ल की पहचान की जाती है. जो कि बकरे की कीमत तय करने में सबसे जरूरी चीज होती है. देश में अजमेरी, बरबरी, तोतापरी और जमुनापारी जैसी कई पाॅपुलर नस्लें पाई जाती हैं. जिनकी पहचान उनके कानों के आकार से ही होती है. मसलन अगर किसी बकरे के कान लंबे, चौड़े और नीचे की तरफ लटके हुए हैं. तो उसे शुद्ध जमुनापारी नस्ल माना जाता है. जो साइज और वजन में काफी भारी होती है.

इसके अलावा कान की बनावट से यह भी साफ पता चल जाता है कि बकरा अंदर से कितना सेहतमंद है. अगर कान की खाल साॅफ्ट, स्मूथ और शाइनी. तो इसका मतलब है कि वह पूरी तरह स्वस्थ है और उसे कोई अंदरूनी बीमारी नहीं है.वहीं अगर उसके कान पर रूखापन है या मक्खियां लग रही हैं. तो समझ लीजिए कि बकरा बीमार हो सकता है.


उम्र का सही अंदाजा लगाने तरीका

पशु बाजार में अक्सर धोखाधड़ी से बचने के लिए किसान बकरे के दांत देखने के साथ-साथ उसके कानों का भी सहारा लेते हैं. अनुभवी लोग बताते हैं कि बकरे के कान की मोटाई और उसकी स्किन में कसाव देखकर उसकी असली उम्र का सटीक अंदाजा लगाया जा सकता है. छोटे और जवान बकरों के कान बहुत कोमल, लचीले और फुर्तीले होते हैं, जबकि जैसे-जैसे बकरा बूढ़ा होने लगता है, उसके कान भारी और थोड़े सख्त होने लगते हैं.

इसके साथ ही कान की नसों का उभार और उसकी त्वचा की गर्माहट यह बताती है कि जानवर का मेटाबॉलिज्म कैसा काम कर रहा है. अगर बकरे का कान छूने पर ठंडा या ढीला महसूस हो तो इसका मतलब है कि वह कुपोषण का शिकार है. इस तरह सिर्फ कान छूकर ही किसान यह बता देते हैं कि बकरा अभी अपनी जवानी के पीक पर है या फिर उसकी उम्र ढल चुकी है. जिससे उन्हें सही सौदा करने में मदद मिलती है.


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खान-पान और बीमारी के लक्षण पहचाने जाते हैं

बकरे के कानों पर नजर रखने से उसकी बीमारी और खान-पान के बारे में तुरंत पता लगाया जा सकता. स्वस्थ बकरा हमेशा अपने कान हिलाता रहता है और आसपास कुछ होता है तो वह उस पर तुरंत रिएक्ट करता है. जो इस बात का संकेत है कि उसका दिमाग और नर्वस सिस्टम एकदम एक्टिव है. वहीं दूसरी तरफ अगर बकरा अपने कान लटकाकर सुस्त खड़ा है और मक्खियों के बैठने पर भी कान नहीं हिला रहा है.

तो समझ जाइए कि वह किसी गंभीर बीमारी या तेज बुखार की चपेट में है. इसके अलाव कान के अंदर की त्वचा का रंग पीला पड़ना औक उस पर चकत्ते दिखना खून की कमी यानी एनीमिया का संकेत होता है. यही वजह है कि बाजार में जाने वाले पुराने और समझदार खरीदार बकरे को खरीदने से पहले उसके कान को अंदर से अच्छी तरह देखते हैं. जिससे बाद में पछताना न पड़े.

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