कुल्थी को हॉर्स ग्राम के नाम से भी जाना जाता है. यह भारत की पारंपरिक दलहन फसलों में शामिल है और खासतौर पर कम बारिश वाले इलाकों में इसकी खेती की जाती है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार, देश में कुल्थी की खेती करीब 5.07 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती है. यह फसल खाने के साथ पशु चारे और हरी खाद के तौर पर भी इस्तेमाल की जाती है.
कुल्थी की खेती के लिए कैसी होनी चाहिए जमीन
कुल्थी ऐसी फसल है जिसे ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती. इसकी खेती के लिए ऐसी जमीन चुननी चाहिए जहां पानी जमा न हो. खेत या बाग की मिट्टी अच्छी जल निकासी वाली हो तो फसल की बढ़वार अच्छे से होती है .कुल्थी की खेती मुख्य रूप से मानसून के आस पास के मौसम में की जाती है. बुवाई का समय स्थानीय मौसम और बारिश पर निर्भर करता है. अच्छी बारिश होने के बाद इसकी बुवाई की जा सकती है. कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार कतारों में बुवाई करने पर करीब 30 सेंटीमीटर कतार से कतार और 10 सेंटीमीटर पौधे से पौधे की दूरी रखनी चाहिए . एक एकड़ के लिए करीब 8 से 10 किलो बीज की जरूरत होती है.
कम पानी में भी तैयार हो जाती है फसल
कुल्थी की खासियत इसका कम लागत वाला होना है. यह सूखे और कम उपजाऊ क्षेत्रों में भी उगाई जाती है. फसल को खेत में ज्यादा सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए पानी की कमी वाले इलाकों में इसे विकल्प के तौर पर अपनाया जाता है.बुवाई के बाद शुरुआती समय में खेत को खरपतवार से मुक्त रखना जरूरी है. पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए मिट्टी की जांच के आधार पर खाद और उर्वरक का इस्तेमाल करना चाहिए. कीट या रोग दिखाई देने पर स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेकर उचित नियंत्रण करना बेहतर रहता है.कुल्थी की फसल सामान्य तौर पर करीब 3 से 4 महीने में तैयार हो जाती है. अच्छी किस्म और सही प्रबंधन से उत्पादन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होती है.
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एक एकड़ में कितनी कमाई हो सकती है
कुल्थी से होने वाली कमाई बाजार भाव, उत्पादन, बीज की कीमत, मजदूरी और खेती की लागत पर निर्भर करती है. पुराने कृषि आर्थिक अध्ययनों में कुल्थी को कम लागत वाली फसल पाया गया है पैदावर का हिसाब प्रति हेक्टेयर खेती की लागत करीब 8,395 रुपये और लागत के ऊपर शुद्ध रिटर्न करीब 8,905 रुपये दर्ज किया गया . हालांकि यह आंकड़ा पुराने समय और एक खास क्षेत्र का है, इसलिए इसे आज की कमाई का सीधा अनुमान नहीं माना जाता. इसलिए किसान को अपनी जमीन, स्थानीय मंडी भाव और खेती की वास्तविक लागत के आधार पर मुनाफे का हिसाब लगाना चाहिए.
उदाहरण के लिए, अगर एक एकड़ से 3 क्विंटल कुल्थी मिलती है और बिक्री भाव 4,000 रुपये प्रति क्विंटल रहता है, तो सकल बिक्री करीब 12,000 रुपये होगी. इसमें से बीज, मजदूरी, जुताई, कटाई और अन्य खर्च घटाने के बाद वास्तविक मुनाफा सामने आएगा. कम पानी, कम लागत और दलहन की मांग को देखते हुए कुल्थी छोटे किसानों के लिए खेती का एक विकल्प बन सकती है.
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