Ragi Farming: दिन हो या रात, किसान बिना समय देखे अपनी फसल की बेहतर पैदावर के लिए मेहनत करते हैं. लेकिन जब बरसात ही साथ न दे तो किसान की सारी मेहनत बर्बाद हो सकती है. महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे कई इलाकों में इस समय कम बारिश की वजह से सूखे जैसे हालात है. ऐसे में अगर आप भी किसी ऐसी फसल की तलाश में है जिसे कम पानी में भी आसानी से उगाया जा सकता है तो रागी आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है. धान के मुकाबले इसे कम पानी की जरूरत पड़ती है.
रागी को मंडुआ या फिंगर मिलेट भी कहा जाता है. आपने देखा होगा कि, धान की खेती में खेत को लंबे समय तक पानी देना पड़ता है, जबकि गेहूं में भी कई बार सिंचाई करनी होती है. लेकिन रागी की खेती में धान-गेहूं के मुकाबले पानी की लागत कम हो जाती है.
रागी की खेती के लिए कैसी मिट्टी चाहिए?
रागी की खेती कई तरह की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन ऐसी जमीन इसके लिए अच्छी रहती है, जहां पानी जमा न हो और खेत में निकासी की व्यवस्था हो. दोमट और बलुई दोमट मिट्टी में इसकी फसल अच्छी हो सकती है. यह फसल कम बारिश वाले इलाकों में भी उगाई जाती है, हालांकि अच्छी पैदावार के लिए सही किस्म और खेती का तरीका जरूरी है.
रागी की बुवाई कब और कैसे करें?
खरीफ सीजन में आमतौर पर मॉनसून की शुरुआत के आसपास इसकी बुवाई की जाती है. कई इलाकों में जून-जुलाई का समय उपयुक्त रहता है. रबी रागी की बुवाई आमतौर पर सितंबर से अक्टूबर के बीच की जाती है. किसान अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र से वहां के हिसाब से सही किस्म और बुवाई के समय की जानकारी ले सकते हैं.
- बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लें.
- बीजों को कतारों में बोना बेहतर रहता है.
- इससे निराई-गुड़ाई और पौधों की देखभाल आसान हो जाती है.
- खेत में खरपतवार दिखे तो समय पर उसे निकाल दें.
- इससे फसल को पोषक तत्व और नमी मिलने में मदद मिलती है.

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रागी की फसल में कितना पानी चाहिए?
रागी की खेती ज्यादातर बारिश के भरोसे भी की जाती है. लेकिन अगर लंबे समय तक बारिश न हो, खासकर पौधों में कल्ले निकलने, फूल आने और दाने बनने के समय, तो जरूरत के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए. खेत में पानी जमा होने से बचाएं.
धान-गेहूं के मुकाबले कितना फायदा?
इससे कितनी कमाई हो सकती है इसे आप एक उदाहरण के जरिए समझ सकते हैं. सरकार के 2025-26 खरीफ सीजन के आंकड़ों के मुताबिक, रागी का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,886 रुपये प्रति क्विंटल था और इसकी अनुमानित उत्पादन लागत 3,257 रुपये प्रति क्विंटल थी. यानी इस हिसाब से लागत और एमएसपी के बीच करीब 1,629 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर था. वहीं, गेहूं के 2026-27 सीजन में एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल और अनुमानित लागत 1,239 रुपये प्रति क्विंटल तय की गई. हालांकि, यह अंतर सीधे किसान का शुद्ध मुनाफा नहीं है और दोनों फसलों के आंकड़े अलग-अलग सीजन के हैं.
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